जयपुर की पहाड़ियों पर एक ऐसा किला खड़ा है, जिसे दुश्मन कभी जीत नहीं सका। इस किले में एक ऐसी तोप रखी है, जो सिर्फ एक बार चली और उसी एक धमाके से उसका नाम इतिहास में दर्ज हो गया। कहा जाता है कि उसका गोला 35 किलोमीटर दूर जाकर गिरा और वहां एक तालाब बन गया। ये कहानी है जयगढ़ किले और उसकी जयबाण तोप की।
दुनिया की सबसे बड़ी तोप
अगर आप सोचते हैं कि सबसे बड़ी तोपें सिर्फ यूरोप में बनीं, तो आप गलत हैं। 300 साल पहले जयपुर के राजाओं ने अपने ही किले के अंदर एक ऐसी तोप बना दी थी, जिसका वजन 50 टन था और जिसे हिलाने के लिए हाथियों की जरूरत पड़ती थी। इसका नाम था जयबाण यानी विजय का बाण। आइए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सूचना पट्टी से जानते हैं इस किले और तोप से जुड़ी पूरी कहानी और रहस्य।
जयगढ़ किला क्या है?
जयगढ़ किला जयपुर के आमेर किले के ठीक ऊपर, अरावली की चील का टीला नाम की पहाड़ी पर बना है। इसे 1726 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इसका मुख्य काम आमेर किले और जयपुर शहर की रक्षा करना था। इसलिए इसे विजय का किला भी कहा जाता है। यह किला आमेर और नाहरगढ़ से सुरंगों के जरिए जुड़ा हुआ है। खास बात ये है कि इस किले पर कभी किसी दुश्मन ने कब्जा नहीं कर पाया था।
जयगढ़ क्यों था इतना खास?
जयगढ़ सिर्फ एक किला नहीं था, बल्कि एक पूरा हथियार कारखाना था। शाहजहां के समय से ही यहां तोपें ढालने का काम शुरू हो गया था। किले के अंदर आज भी पुरानी भट्टी, तोप के सांचे और लेथ मशीन देखी जा सकती हैं। उस दौर में पूरे एशिया में ऐसा कारखाना कहीं और नहीं था। यहीं पर राजघराने का खजाना भी रखा जाता था। किले के अंदर पानी के लिए तीन बड़े टांके भी बनाए गए थे। सबसे बड़े टांके में करीब 60 लाख गैलन पानी जमा हो सकता था, जो महीनों तक किले की जरूरत पूरी करता था।
जयबाण तोप, दुनिया की सबसे बड़ी पहियों वाली तोप
जयगढ़ किले का सबसे बड़ा आकर्षण है जयबाण तोप। इसे 1720 में, मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के समय में, किले के अंदर ही बनाया गया था।
- लंबाई: करीब 20 फीट, पूरे ढांचे के साथ 31 फीट से ज्यादा
- वजन: लगभग 50 टन
- नाल: करीब 11 इंच
- पहिए: लोहे के 4 मजबूत पहिए, इसे 360 डिग्री तक घुमाया जा सकता था
- बारूद: एक बार चलाने के लिए करीब 100 किलो बारूद और 50 किलो का गोला
तोप की नाल पर फूल-पत्तियों की नक्काशी, मोर की जोड़ी और बतख की आकृतियां बनी हैं। इस पर संस्कृत में शिलालेख भी खुदा हुआ है। आज इसे मौसम से बचाने के लिए टिन शेड के नीचे रखा गया है।
सिर्फ एक बार क्यों चली थी जयबाण?
जयबाण को कभी किसी असली युद्ध में इस्तेमाल नहीं किया गया था। इसका मकसद ही दुश्मन को डराना और अपनी ताकत दिखाना था। कहा जाता है कि इसे सिर्फ एक बार टेस्टिंग के लिए चलाया गया था। गोला जयपुर से करीब 35 किमी. दूर चाकसू के पास गिरा। गिरने से जमीन में इतना बड़ा गड्ढा हुआ कि वहां तालाब बन गया, जिसे आज भी लोग तोप का तालाब कहते हैं। एक कथा के अनुसार, तोप की गर्जना इतनी तेज थी कि आसपास के घर हिल गए थे, कई लोगों के कान के पर्दे फट गए थे और तोपची समेत कुछ सैनिक शॉकवेव से मारे गए थे। इसलिए इसके बाद इसे दोबारा चलाने का फैसला नहीं लिया गया था। दूसरी वजह खर्च भी थी। एक बार चलाने में ही इतना बारूद और संसाधन लगता था कि इसे बार-बार चलाना संभव नहीं था।
जयगढ़ किला कैसे पहुंचे?
जयगढ़ किला जयपुर शहर के केंद्र से करीब 15 किमी. दूर है। आमेर किले से यह सिर्फ 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए दोनों किले एक ही दिन में घूमे जा सकते हैं।
सड़क से: जयपुर से आमेर रोड होते हुए टैक्सी, कैब, ऑटो या बाइक से 30-40 मिनट में पहुंच सकते हैं। आमेर से जयगढ़ तक पैदल रास्ता भी है, लेकिन चढ़ाई होने के कारण जीप या टैक्सी बेहतर रहती है।
रेल से: सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन जयपुर जंक्शन है, जो करीब 16 किमी. दूर है। वहां से कैब या बस आसानी से मिल जाती है।
हवाई जहाज से: जयपुर का सांगानेर एयरपोर्ट करीब 23 किमी. दूर है। वहां से टैक्सी से सीधे किला पहुंचा जा सकता है।
टाइमिंग और टिकट: किला सुबह 9 बजे से शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है। अक्टूबर से फरवरी के बीच घूमना सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि मौसम सुहावना रहता है।
जयगढ़ किला सिर्फ पत्थरों की दीवार नहीं है, बल्कि राजपूताना, इंजीनियरिंग और शौर्य की कहानी है। जयबाण तोप इस बात का सबूत है कि 300 साल पहले भी भारत तकनीक में कितना आगे था। अगर आप जयपुर जा रहे हैं, तो इस किले को अपनी लिस्ट से बाहर मत रखिए, क्योंकि यहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, आंखों के सामने खड़ा दिखता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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