जयपुर को Pink City कहा जाता है, और यहां हर गली में कोई न कोई कहानी है। आमेर की तरफ जाते हुए एक ऐसी जगह पड़ती है जहां पहुंचकर लगता है जैसे टाइम रुक गया हो, नाम है पन्ना मीना का कुंड। जयपुर आने वाले ज्यादातर टूरिस्ट आमेर किले तक जाकर वापस लौट जाते हैं, और इस खजाने को मिस कर देते हैं। चारों तरफ से नीचे उतरती हुईं सैकड़ों सीढ़ियां, एक-दूसरे को काटती हुई लाइनें और बीच में ठंडा-ठंडा पानी। गर्मी में भी यहां सुकून मिलता है। ये सिर्फ एक बावड़ी नहीं है, ये जयपुर की पुरानी इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा नमूना है।
अद्भुत है पन्ना मीणा का कुंड
अगर आपने जयपुर देखा है और पन्ना मीना का कुंड नहीं देखा, तो आपका जयपुर ट्रिप अधूरा रह जाएगा। जयपुर शहर की भीड़-भाड़ से दूर, आमेर में बसा ये 16वीं शताब्दी का कुंड आज के वक्त में बहुत कुछ बयां करता है। कहते हैं कि जयपुर के राजाओं ने इसे सिर्फ पानी के लिए नहीं बनाया था। यहां की हर सीढ़ी, हर कोना कुछ कहता है। जो लोग जयपुर को सिर्फ किलों से जानते हैं, उन्हें एक बार इस कुंड की सीढ़ियों पर बैठकर जयपुर को नए नजरिए से देखना चाहिए। आइए जयपुर के अंबकेश्वर महादेव मंदिर के महंत संतोष कुमार व्यास से जानते हैं पन्ना मीणा कुंड की खासियत।
आमेर में जो सबसे पुराना मंदिर है, वो है अंबकेश्वर महादेव मंदिर। ये मंदिर आम जमीन से करीब 22 फीट नीचे स्थित है। मान्यता है कि आमेर नाम भी इसी अंबकेश्वर महादेव से ही निकला है। पहले इसे अंबकेश्वर और फिर आमेर कहा जाने लगा। इस मंदिर और पन्ना मीना कुंड का एक बहुत गहरा कनेक्शन है।
पन्ना मीणा नाम कैसे पड़ा?
लोग इसे आम बोलचाल में पन्ना मियां कहते हैं, लेकिन इसका असली नाम पन्ना मीना है। इसके नाम के पीछे दो कहानियां प्रचलित हैं। पहली कहानी ये है कि इस कुंड को बनाने वाला जो मुख्य आर्किटेक्ट या ठेकेदार था, उसकी निर्माण के दौरान ही मृत्यु हो गई थी।
दूसरी और सबसे मजबूत कहानी मीणा समाज से जुड़ी है। आज से करीब 1100 साल पहले आमेर में मीणाओं का राज था। इस कुंड के पीछे जो पहाड़ी है, उसे आज भी कुंत गढ़ कहा जाता है, जो मीणाओं का गढ़ था। इसलिए, मीणा समाज के सम्मान में इसका नाम पन्ना मीना रख दिया गया। सोचिए, एक राजा इतना पैसा खर्च करके सिर्फ पानी के लिए बावड़ी क्यों बनाएगा? ये सिर्फ बावड़ी नहीं, एक आस्था थी।
कछवाहा वंश ने जिसे कुलदेवता माना, वहीं से शुरू हुआ जयपुर
इस पूरी जगह की जड़ें कछवाहा वंश से जुड़ी हैं। जब कछवाहा राजवंश आमेर आया, तो उन्होंने सबसे पहले अंबकेश्वर महादेव को ही अपना कुलदेवता माना। कहते हैं कि इसी मंदिर को साक्षी मानकर धीरे-धीरे आमेर का विस्तार हुआ। हवेलियां बनीं, महल बने, किले बने और फिर तो जयपुर जैसा पूरा शहर ही बसा दिया गया। यानी जयपुर की नींव में भी इसी मंदिर का आशीर्वाद है।
कैसे पहुंचे पन्ना मीणा कुंड?
पन्ना मीणा का कुंड आमेर में है, जयपुर शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर है।
लोकल बस: जयपुर के हवा महल से आमेर के लिए सीधी लो-फ्लोर बसें चलती हैं। किराया 20-30 रुपये है।
ऑटो व कैब: सिंधी कैंप या रेलवे स्टेशन से ऑटो 250-300 रुपये में और Ola और Uber 350-400 रुपये में पहुंचा देगा।
पन्ना मीणा कुंड अपनी ज्योमेट्रिकल सीढ़ियों के लिए दुनिया भर में फेमस है, लेकिन अगर आप अगली बार आमेर जाएं तो सिर्फ फोटो मत खींचिएगा। पहले उस कुंड की सीढ़ियों को महसूस कीजिए, फिर 22 फीट नीचे उतरकर अंबकेश्वर महादेव के दर्शन कीजिए। तब आपको समझ आएगा कि आमेर सिर्फ एक पर्यटक स्थल नहीं, एक पूरी सभ्यता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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