भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे अमर आवाजों में से एक, भारत रत्न एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जीवनगाथा जल्द ही बड़े पर्दे पर उतरने जा रही है। चेन्नई में 'द म्यूजिक एकेडमी' में उनकी 110वीं जयंती के पावन अवसर पर 16 सितंबर 2026 को इस बायोपिक की आधिकारिक घोषणा की गई। इस महत्वाकांक्षी फिल्म में नेशनल क्रश रश्मिका मंदाना महान गायिका 'अम्मा' की भूमिका निभाती नजर आएंगी। फिल्म का निर्देशन 'जर्सी' फेम गौतम तिन्ननुरी कर रहे हैं, जबकि संगीत की जिम्मेदारी अनिरुद्ध रविचंदर को सौंपी गई है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी कौन है? जानते हैं आगे...
कौन थीं एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी (कुंजम्मा)?
16 सितंबर 1916 को मदुरै (तमिलनाडु) में जन्मी सुब्बुलक्ष्मी को बचपन में प्यार से 'कुंजम्मा' कहा जाता था। उनकी मां षण्मुगावदिवम्मल एक देवदासी थीं और वीणा बजाती थीं, वहीं पिता सुब्रमण्यम अय्यर भी संगीत प्रेमी थे।
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- बचपन और पहली रिकॉर्डिंग: सुब्बुलक्ष्मी ने मशहूर संगीतकार पंडित नारायण राव व्यास से संगीत की तालीम हासिल की। महज 10 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली रिकॉर्डिंग की थी।
- मद्रास म्यूजिक एकेडमी में डेब्यू: मात्र 13 साल की उम्र में (1929 में) उन्होंने मद्रास म्यूजिक एकेडमी के मंच पर गाना गाया। अपनी मां के साथ मिट्टी के घरौंदे बना रही कुंजम्मा को सीधे मंच पर ले जाया गया था, जहां उनकी सुरीली आवाज ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सिनेमा का सफर और ऐतिहासिक 'मीरा' फिल्म
1936 में उनके एक कार्यक्रम के बाद प्रसिद्ध पत्रकार टी. सदाशिवम ने उनके बारे में एक लेख लिखा। बाद में दोनों ने शादी कर ली। सदाशिवम ने उनकी प्रतिभा को सिनेमा के जरिए आम जनता तक पहुंचाने का फैसला किया।
- 'सेवासादन' (1938): इस फिल्म से सुब्बुलक्ष्मी को दक्षिण भारत में घर-घर में पहचान मिली।
- 'मीरा' (1945): अपनी पत्नी के सुझाव पर सदाशिवम ने मीरा बाई पर फिल्म बनाई। 136 मिनट की इस फिल्म में सुब्बुलक्ष्मी ने खुद 20 गाने गाए। यह फिल्म इतनी हिट रही कि 1947 में इसे 'मीराबाई' नाम से हिंदी में फिर से रिलीज किया गया।
जब मिली राष्ट्रीय पहचान
21 नवंबर 1947 को जब 'मीराबाई' का हिंदी प्रीमियर हुआ, तो उसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, लॉर्ड माउंटबेटन, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां मौजूद थीं। सरोजिनी नायडू ने ही सुब्बुलक्ष्मी का परिचय देते हुए उन्हें 'नाइटिंगेल ऑफ इंडिया' (भारत की कोकिला) का खिताब दिया।
1953 में दिल्ली के एक कार्यक्रम में सुब्बुलक्ष्मी का गाना सुनकर पंडित नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "आपके सामने मैं क्या हूं? केवल एक मामूली प्रधानमंत्री।" गांधी जी उनके 'रघुपति राघव राजा राम' और 'हरि तुम हरो' भजन के बहुत बड़े प्रशंसक थे। 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या की खबर सुनकर वे बेहोश हो गई थीं और उन्होंने महीनों तक 'हरि तुम हरो' भजन नहीं गाया।
अंतरराष्ट्रीय मंच और पुरस्कारों की सूची
1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा न्यू यॉर्क में प्रदर्शन करने वाली वह पहली भारतीय गायिका बनीं। 1997 में पति सदाशिवम के निधन के बाद उन्होंने गाना छोड़ दिया और 11 दिसंबर 2004 को उनका देहांत हो गया।
| सम्मान / उपलब्धि | साल | विशेषता |
| पद्म भूषण | 1954 | शास्त्रीय संगीत में योगदान के लिए |
| रेमन मैगसेसे पुरस्कार | 1974 | यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय संगीतकार |
| पद्म विभूषण | 1975 | देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान |
| भारत रत्न | 1998 | देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाली पहली संगीतकार |
| संयुक्त राष्ट्र में प्रदर्शन | 1966 | यूएन महासभा में गाने वाली पहली भारतीय गायिका |
एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य
बता दें कि कुजंम्मा से जुड़े कुछ तथ्य हैं, जिनके बारे में पता होना जरूरी है-
- उन्हें कांजीवरम साड़ियों का बहुत शौक था। बुनकर मुथु चेट्टियार ने उनके लिए एक खास नेवी ब्लू शेड की साड़ी बनाई। यह रंग उन पर इतना खूब जचा कि इस शेड का नाम ही 'एमएस ब्लू' (MS Blue) पड़ गया।
- उनके द्वारा गाए गए 'विष्णु सहस्रनाम' को यूट्यूब पर 10 करोड़ से ज्यादा बार सुना गया है। 'श्री वेंकटेश सुप्रभातम' को 4.7 करोड़ और 'भज गोविंदम' को 1.7 करोड़ व्यूज मिल चुके हैं।
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रश्मिका मंदाना के लिए बड़ी चुनौती
रश्मिका मंदाना के लिए यह बायोपिक उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट मानी जा रही है। 8 साल की गहन रिसर्च के बाद लिखी गई इस कहानी को पैन-इंडिया स्तर पर पर्दे पर उतारने की तैयारी है।
निष्कर्ष
एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी केवल एक शास्त्रीय गायिका नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति और भक्ति रस का प्रतीक थीं। उनकी अमर आवाज और प्रेरणादायक जीवन को नए दौर के दर्शकों तक पहुंचाने का यह प्रयास भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।
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Images: Bharatmatamandir.in
