अगर मैं आपसे कहूँ कि मैं साक्षात गांधी जी से मिलकर आई हूँ तो आप क्या कहेंगे, यही ना कि मैं यह कैसी बातें कर रही हूँ, ज़रूर कोई स्वप्न देखा होगा पर सचमुच मैं गांधी जी से ही मिल कर आई हूँ। हुआ यूं कि विक्रमशिला विद्यापीठ द्वारा आयोजित 23वें अधिवेशन सह-सम्मान समारोह के अंतर्गत महात्मा गांधी आश्रम, सेवाग्राम, वर्धा में तीन दिन गांधी यात्री निवास में रहने का मौका मिला।

शहर की भीड़ से दूर सुंदर और शांत स्थान। पक्षियों के कलरव के बीच सुंदर पेड़-पौधे, फूल और उन पर इठलाती तितलियाँ, चहचहाती मैना के झुंड और कूद-फांद मचाती लंगूरों की टोलियां। प्रकृति से सराबोर, ऐसी खूबसूरत जगह, जो किसी का भी मन मोह ले।

गांधी यात्री निवास के ठीक सामने गांधी जी का आश्रम अद्भुत, मनोरम जगह। वहां घूम-घूम कर अचरज से सभी चीजों को रुक-रुक कर देख रही थी। गांधी जी की कुटिया, यहां अपने प्रवास के दौरान गांधी जी द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला साधारण और जरूरत भर का सामान। चाहे वह सामान रसोई का हो, शयनकक्ष, स्नानघर, मालिश कक्ष और या फिर ऑफिस का। सभी कुछ वैसे ही उसी स्थिति में सहेज के रखा गया है। छोटी सी कच्ची कुटिया, चिकनी मिट्टी से लीपा गया फर्श उनके सादगी भरे जीवन को दर्शाता है।

सिर्फ गांधी जी की कुटी ही नहीं बल्कि उनकी कुटिया के पास बा (कस्तूरबा) कुटी, परचूरे कुटी, विनोबा भावे द्वारा लगाए गए पौधे जो अब विशाल पेड़ों के रूप में खड़े मानो गांधी जी के वहां होने का एहसास दिला रहे हों। ऐसा लग रहा था कि जैसे एक सपना हो जिसमें गांधी जी के पूरे युग को मैं देख रही हूँ। सभी कुछ तो ऐसा ही रहा होगा ना।

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तीन दिन के प्रवास के दौरान तीनों दिन गांधी आश्रम जाने का मोह मैं नहीं छोड़ सकी। पहले दो दिन शनिवार और रविवार के कारण आश्रम में कर्मचारी कम ही नजर आए लेकिन सोमवार को तो गांधी आश्रम जाने पर जैसे जीवन सार्थक हो गया। उस दिन जब मैं आश्रम गई, तो बापू की कुटिया के आंगन में कुछ लोग चरखे पर सूत कातते नजर आए। लेकिन तभी बापू की कुटिया के अंदर नज़र पड़ी एक वृद्ध महिला पर, जो कि सफेद रंग की खादी की सूती धोती पहने, आंखों पर चश्मा लगाए, अपनी ही धुन में मगन चरखे पर सूत कात रहीं थीं। चेहरे से ही सभ्य और पढ़ी-लिखीं नजर आ रही थीं।

पहनावे में गांधी जी की झलक, उनमें एक अलग सा आकर्षण था। उनकी सादगी, एकाग्रता, कर्मठता मुझे अपनी तरफ खींच रही थी और मैं मंत्र मुग्ध हो उनकी तरफ खिंची चली गई। मैं उनसे  बहुत सारी बातें करना चाहती थी, मेरे इस भाव को शायद उनके करीब ही बैठी एक कर्मचारी लड़की समझ गई थी।  उस ने कहा कि कृपया अभी रुकें, जब तक ये चरखा कातेंगी तब तक इनका मौन रहेगा।

उस लड़की से बात करने पर मुझे पता चला कि ये कुसुम ताई हैं। कुसुम ताई यहां की सबसे उम्रदराज महिला हैं और इन्होंने गांधी जी के साथ बहुत छोटी उम्र से काम किया है। यह सुन मेरी उनसे बात करने की जिज्ञासा और भी बढ़ गई।

मैं उनके पास ही बैठ गई और उनके मौन खत्म होने का इंतज़ार करने लगी। वह बड़ी लगन से चरखा चलाने में व्यस्त थीं। जब मौन खत्म हुआ तो मैंने उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अपना परिचय देते हुए बात करनी शुरू की। इस तरह बातों का सिलसिला शुरू हुआ।

उनके बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी उम्र इस समय 88 वर्ष है और उन्होंने बालपन से ही गांधी जी के साथ कार्य किया है। कुसुम ताई की शिक्षा के बारे में जान कर और भी हैरानी हुई जब उन्होंने बताया कि उन्होंने उस समय में ग्रेजुएशन की थी जबकि लड़कियों की पढ़ाई पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता था।

शिक्षा के बारे में गांधी जी के विचारों को पूछने पर कुसुम ताई ने बताया कि गांधी जी चाहते थे कि हमारे बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ आत्मनिर्भर भी बनें। इसके लिए गांधी जी ने एजूकेशन फॉर लाइफ शुरू किया। इस शिक्षण संस्थान को चलाने के लिए गांधी जी के कहने पर गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने एक शिक्षा शास्त्री पति-पत्नी को यहां भेजा। इसी शिक्षा की उद्योगधारा में मैं यहाँ पढ़ने आई थी। यहां पूरे हिंदुस्तान से लोग पढ़ने के लिए आते थे। इस शिक्षण संस्थान में शिक्षा का स्तर पूर्व बुनियादी (छोटे बच्चे), बुनियादी (आठवीं तक), उत्तर बुनियादी (दसवीं तक), उत्तम बुनियादी (ग्रैजूएशन तक) इस तरह से खंड-खंड करके बनाया गया था। 

आश्रम में इन छात्र छात्राओं के लिए ‘बुनियादी’ के हिसाब से हॉस्टल भी थे। लड़कियों का अलग और लड़कों का अलग। यहां पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार की भी शिक्षा दी जाती थी। सभी का भोजन एक जैसा होता था और इस भोजन को हम विद्यार्थी स्वयं ही बनाते थे। हमें भोजन के बारे में भी पढाया जाता था। खेती, गौशाला, बुनाई, कताई का काम होता था, उसी के द्वारा बच्चों को बहुत सारी बातों का ज्ञान दिया जाता था। इसके अलावा गणित, भाषा, भूगोल भी पढ़ाया जाता था। हम लोग सुबह की प्रार्थना शांति भवन में और शाम की प्रार्थना संगीत भवन के सामने करते थे।

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कुसुम ताई इशारा करके बता रहीं थी कि हम सभी विद्यार्थी वहाँ सामने रहते थे। उनके भावों और चेहरे पर आई चमक को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वो फिर से अपने विद्यार्थी जीवन में लौट आई हों। जब वह अपने विद्यार्थी जीवन के बारे में बता रही थीं तो उनका उत्साह देखते ही बनता था। उन्होंने गांधी जी की कुटिया के बारे में बताते हुए कहा कि देखिये इस कुटिया में गांधी जी रहा करते थे। वहां देखिये कुटिया में ऊपर की तरफ एक ओउम लिखा है। यह ओउम ऑस्ट्रिया की रहने वाली गांधी जी की एक शिष्या जिसका नाम गांधी जी ने मीरा बेन रखा था, उसने लिखा था। हमने देखा वह ओउम अभी भी काफी सही स्थिति में है।

थोड़ी देर सोचते हुए वो बोलीं कि इस आश्रम के निर्माण और सारी व्यवस्था करने गांधी जी से पहले मीरा बेन यहां आईं और सारी व्यवस्था की। इसमें उनकी मदद की जमना लाल बजाज जी ने। यह सारी जमीन जमना लाल बजाज की ही है। उन्होंने ही यह जमीन आश्रम के लिए उन्हें दी थी। और तुम्हें पता है! पहले तो मीरा बेन आश्रम में ना रहकर गांव में ही रहती थीं। 

वहां वे मलेरिया से बार-बार बीमार रहने लगीं। तब गांधी जी ने उनसे कहा कि तुम भी यहीं आश्रम में आ कर रहो तब यहाँ उनके लिए भी एक कुटिया बनवाई गई। उन्होंने बताया कि मीरा बेन गाँव के बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ जागरूक करती थीं कि तुम्हारा देश इतने साल गुलाम रहा है, इसके लिए तुम सब भी मिलकर कुछ करो, अकेले गांधी जी क्या कर सकते हैं? सफाई और स्वच्छता के बारे में बताती थीं। फिर यहां आश्रम में आकर काम भी करती थीं। वो बोले जा रहीं थीं, और मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरे सामने चलचित्र चल रहा हो।

कुछ रुक कर फिर वह बोली एक बात और बताएँ आपको कि बापू को सामान  संग्रह करना कतई पसंद नहीं था। उन्होंने बताया कि वे स्वयं भी बहुत कम सामान रखते थे। वे कहा करते थे कि सिर्फ तीन जोड़ी कपड़े ही रखें। एक धो के रखने को, दो पहनने के लिए, यानी सिर्फ जितनी ज़रूरत हो उतना ही सामान हो। और तो और वह अपना बिस्तर भी बहुत बड़ा नहीं रखते थे। वो सो कर उठने पर उसे यूं ही लपेट कर सामने रख दिया करते थे। बापू का इतना प्रभाव था कि उनकी इस बात का अनुसरण यहाँ रहने वाले सभी लोग करते थे।

कुसुम ताई ने बताया कि भारत छोड़ो आंदोलन का पहला प्रस्ताव यहां आदी निवास में ही पास हुआ था। इसके लिए पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृपलानी जी आदि आए। उन्होंने अंग्रेजों से कहा कि तुमने बहुत साल हमारे देश की सेवा कर ली, अब आप यहां से जाएँ। यह बताते हुए उनके चेहरे पर जो जोश और गर्व के भाव थे वो बहुत अच्छे लग रहे थे।

उन्होंने इशारा करके बताया कि यहाँ गांधी जी के मंत्री महादेव देसाई बैठ कर गांधी जी के नोट्स और खबरें लिखते थे। यहीं दूसरी तरफ बैठ कर चिट्ठी पत्री आदि का काम भी किया जाता था।

एक कुटी में सीमेंट का फर्श देख कर जब मैंने उत्सुकता जताई तो उन्होंने बताना शुरू किया कि राज घराने की लड़की राजकुमारी अमृत कौर को जब पता चला कि गांधी जी यहां आए हुए है तो वह उनसे मिलने यहाँ आईं। उन्होंने गांधी जी से इच्छा जाहिर की कि वे भी उनके साथ काम करना चाहती हैं और आश्रम में रह कर सेवा करना चाहती हैं। राजकुमारी ने गांधी जी को बताया कि उनकी एक समस्या है कि उन्हें मिट्टी से एलर्जी है। तब गांधी जी ने कहा कि तुम एक कुटिया बनाओ और उसमें रहो। और मात्र इस कुटिया का फर्श सीमेंट से बनवाया गया था।

गांधी जी की कुटिया में बाथ टब, संडास और कमोड  को देख कर मुझे बहुत हैरानी हुई इस पर कुसुम ताई ने बताया कि बापू एक बार बाहर गए हुए थे तब राजकुमारी अमृत कौर ने गांधी जी की कुटिया में बाथ टब, संडास और कमोड लगवा दिया। जब बापू लौट कर आए और यह देखा तो बहुत नाराज हुए। इस पर राजकुमारी अमृत कौर ने उन्हें कहा कि बापू तुम सुबह तीन बजे उठते हो और 4.20 पर प्रार्थना करते हो। सुबह अंधेरे में शौच और स्नान वगैरह के लिए बाहर जाना पड़ता है आपको इसी परेशानी से बचाने के लिए ऐसा किया है।

वहीं कमोड के पास पत्र, पुस्तक, अखबार आदी रखने का शेल्फ भी लगवाया था। गांधीजी के पास जो भी पत्र आते थे वह वहीं बैठकर पढ़ा करते थे और इस तरह से वह उस समय का सदुपयोग करते थे।

इसके बाद कुसुम ताई ने इशारा किया एक अन्य कुटी की ओर तथा कहा कि यह सिक रूम है। आश्रम में यदि कोई भी बीमार होता था तो बापू उसे वहां रखते थे और उसका इलाज भी करते थे। एक बार सरदार वल्लभ भाई बीमार हो गए तो गांधी जी ने उन्हें भी इसी कमरे में रखा और नेचुरोपैथी ट्रीटमेंट दिया। गांधी जी बाहर आंगन में सोते थे। बारिश आती तो बरांडे में आ जाते थे। उनकी खाट भी बाहर रखी रहती थी। वे सूर्य स्नान करते थे। बापू, बा, आश्रम में रहने वाले और अन्य आने जाने वाले सभी आदी निवास के बरामदे में एक साथ बैठ कर भोजन करते थे। यहां खाना बनाने, परोसने, बरतन रखने आदि सभी काम, सब लोग अपनी-अपनी बारी से किया करते थे। और सब लोग अपने-अपने बर्तन खुद साफ किया करते थे।

ऐसा लग रहा था कि मानो कुसुम ताई छोटी से छोटी बात भी मुझसे साझा करना चाहती थीं। उन्होंने बताया कि यहां आश्रम में सांप बहुत निकलते थे। तब बापू ने कहा कि किसी भी सांप को मारना नहीं है, सभी को जीने का अधिकार है। इसका तरीका यह निकाला गया कि एक सांची बनाई गई। उससे सांप को उसके मुंह से पकड़ तक पिंजरे में रखा जाता और दूर जंगल में उसे छोड़ दिया जाता था। सांप का वह पिंजरा अभी भी यहां पर रखा है।

 कुसुम ताई ने एक बार का वाकया बताते हुए बताया कि एक बार बापू घूमने जा रहे थे तभी उन्हें साबरमती आश्रम में संस्कृत के प्रकांड पंडित परचूरे शास्त्री मिले। उन्होंने बापू को बताया कि मुझे कुष्ठ रोग हो गया है। मेरा परिवार है, मेरे पास सामाज है लेकिन मेरे इस कुष्ठ रोग के कारण कोई भी मेरे पास नहीं आना चाहता, कोई मुझे देखना भी नहीं चाहता। शास्त्री जी ने गांधी जी से कहा कि मैं आपके पास आकर रहना चाहता हूँ और आपके पास ही मरना चाहता हूँ। तो पता है बापू ने क्या किया उन्होंने आश्रम में परचूरे शास्त्री जी के लिए एक कुटी बनवा दी और आश्रम में सभी कार्यकर्ताओं को बुलाकर कहा कि यहां परचूरे शास्त्री जी आए हैं, उन्हें कुष्ठ रोग हुआ है। मैं उनकी सेवा करुँगा अगर किसी को शास्त्री जी के कुष्ठ रोग से परेशानी हो या डर लगता है तो वह जा सकता है।

बापू खुद परचूरे शास्त्री जी की रोजाना सेवा करते, उनकी मालिश करते थे। बापू ने यह भी आश्रम में कह दिया था कि जिस किसी को भी संस्कृत पढ़नी, सीखनी हो, वेदों का अध्ययन करना हो वे शास्त्री जी के पास जा सकता है। परचूरे कुटी अभी भी यहां सेवाग्राम आश्रम में है।

कुसुम ताई ने बताया कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव यहीं इस आश्रम में पास हुआ था और 1942 के आंदोलन के लिए यहां से सभी लोग चले गए। इस आंदोलन के लिए जाते समय बा ने यहां एक बबूल का पेड़ लगाया था। इसके ठीक सामने ही पीपल का पेड़ है जिसे गांधी जी ने 1936 में लगाया था। इसके करीब ही विनोबा जी ने पीपल का एक पेड़ लगाया।

एक बार की बात बताते हुए कुसुम ताई ने कहा कि बापू तो शांति के दूत थे। देश में हिंदु-मुस्लिम दंगे हो गए। तीन चार महीने ही यहां रहने के बाद अगस्त 1946 को गांधी जी यहां से नवाखाली (अब बांगला देश में है) चले गए। वहां के बाद गांधी जी पंजाब, उड़ीसा, बिहार आदि राज्यों में जहां-जहां दंगे हुए, सभी जगहों पर गए। गांधी जी के जाने पर वहां हर जगह पर दंगे रुक गए। जब सभी जगह दंगे रुक गए और जब थोड़ी शांति हो गई तो गांधी जी ने वापस यहां सेवाग्राम आश्रम में लौटने का निर्णय लिया। उनके आने से पहले उनकी कुटी साफ कर दी गई। लेकिन 30 जनवरी 1946 को प्रार्थना के लिए जाते समय दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु का किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था। 

कोई भी इस बात को मानने को तैयार ही नहीं था कि अब बापू यहां सेवाग्राम आश्रम में अपनी इस कुटिया में कभी नहीं लौटेंगे। पर यह कुटी अभी भी उनका इंतजार कर रही है। इस कुटिया का नाम ‘आखिरी निवास’ रख दिया गया। यह बात बताते बताते वह भावुक हो गईं और उनके भावों को देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे कुटी के साथ-साथ उनकी आँखों को अभी भी कहीं न कहीं बापू के आने का  इंतज़ार है।

बहुत सारी बातें हुई कुसुम ताई से उनके बारे में, गांधी जी और उनके विचारों के बारे में और आज की शिक्षा के संदर्भ में उनके विचारों के बारे में। कुसुम ताई ने हर सवाल का बहुत सहजता से जवाब दिया।

आपको आश्चर्य होगा कि वह बिना रुके बोले चले जा रही थीं और मैं उन्हें मंत्रमुग्ध सुनती जा रही थी। उम्र के इस पड़ाव में भी कुसुम ताई पूर्णतया स्वस्थ हैं। मैं उनके साथ करीब 45 मिनट तक रही। बहुत सारी बातें मन में अभी भी थीं। उठकर जाने का मन ही नहीं कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि बापू कुसुम ताई के कारण आज भी वहां आश्रम में साक्षात हैं।

कुसुम ताई बहुत कम उम्र में ही प्रतिष्ठान द्वारा संचालित विद्यालय में एक छात्रा के तौर पर पढ़ने आईं थीं तथा बाद में वहीं की सम्मानित शिक्षिका भी बन गईं और वहीं के एक शिक्षक से उनका विवाह हो गया और उनके बच्चों ने भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं से ली और अलग अलग कार्यालयों के उच्च पदों पर रहे और कार्य कर रहे हैं।

इस लघु-मुलाकात में उन्होंने छोटी उम्र से ही बापू को पास से देखने-सुनने तथा उनसे मिलने संबंधी अनेकों संस्मरणों को सुनाया, जिनमें - गुलाम भारत के वाइसराय माउंट बेटेन, प्रथम राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, जमना लाल बजाज, इंदिरा गाँधी आदि से जुड़े बापू के प्रसंगों को बताया जो काफी सूचनात्मक व रोचकतापूर्ण थे।

अंत में कुसुम ताई ने मुझे चरखे पर सूत कातना भी सिखाया जो कि सचमुच कभी ना भूलने वाला अनुभव था। करीब पौने घंटे की इस मुलाकात में उनके व्यक्तित्व से मैं काफी प्रभावित हुई और तो और इस दरम्यान उनके अंदर मुझे बापू के होने का आभास भी मिलता रहा। मैंने बापू को तो नहीं देखा लेकिन एक पल को ऐसा लगा जैसे मैं बापू से मिल आई। तो देखा अब तो आपको विश्वास हुआ ना कि मैं सचमुच बापू से ही मिलकर आई हूँ।

लेखक- सुषमा सिंह
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सुश्री सुषमा सिंह, भारत मौसम विज्ञान विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में कार्यरत, विद्यावाचस्पति और विद्या सागर की मानद उपाधि से विभूषित है। कविताएं, गीत, छंद, बाल कविताएं, कहानी, लघुकथाएं और यात्रा वृत्तांत आदि लिखती हैं।)