मैं पेशे से एक ट्रैवल व्लॉगर हूं। ट्रैवल करना मेरा पेशा ही नहीं, मेरा जुनून भी है। आप जब अपने जुनून को ही अपना पेशा बना लेते हो, तो आपको वो सारे काम अच्छे लगते हैं जो आप करते हैं। चूंकि मुझे घूमना-फिरना, जगहों को एक्सप्लोर करना, नए लोगों से मिलना और अलग-अलग संस्कृतियों से रूबरू होना पसंद है, इसलिए मैंने जर्नलिज्म के क्षेत्र को छोड़कर इसे ही अपना लिया। 

मुझे शुरू से लगता था कि मैं 9-5 जॉब के लिए बनी ही नहीं हूं। मैं वो परिंदा हूं, जो खुले आसमान में ही अच्छा लगता है। घूमने-फिरने के मेरे शौक में मैंने कई जगहों को एक्सप्लोर किया है। कई अच्छे-बुरे और अद्भुत एक्सपीरियंस को मैंने जिया है। उसी में से एक शानदार अनुभव आपके साथ शेयर करना चाहूंगी।

मैं यूं तो काफी समय से घूम रही हूं और कई सारी जगहों को एक्सप्लोर कर चुकी हूं, लेकिन हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के पास तीर्थन वैली की सोलो ट्रैवलिंग मेरे लिए सबसे ज्यादा खूबसूरत और यादगार लम्हे रहे हैं। वैसे तो मैं नई-नई जगहों को खोजने के लिए बहुत उत्साहित रहती हूं, लेकिन तीर्थन वैली मेरे दिल के बहुत करीब है और इसलिए मैं हर बार वहां जा सकती हूं।

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मैं पहली बार साल 2017 में तीर्थन वैली की यात्रा के लिए गई थी और सच मानिए उस दिन से अब तक इस जगह ने मेरे दिल में पहली जगह बनाए रखी है। तीर्थन घाटी एक ऑफबीट डेस्टिनेशन है, जो हर ट्रैवलर के लिए कुछ न कुछ संजोए बैठी है। आप यहां, ट्रैकिंग, फिशिंग, कैंपिंग, वाइल्डलाइफ वॉचिंग और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। यहां जाने के लिए सीधी बसें नहीं हैं, इसलिए मैंने पहले औत तक की बस की और फिर वहां से कैब के जरिए तीर्थन घाटी पहुंच गई। यहां चारों तरफ फैली हुई शांति, नदियों का कलकल करता पानी, पक्षियों की चहचहाट जब आपके कानों में पड़ती है न, तो मन का सारा तनाव जैसे नदियों के साथ बह जाता है। 

बड़ी-बड़ी चट्टानों और पहाड़ों के एकदम बीच में सेरेलोसर झील है। यहां तक पहुंचने के लिए जलोरी पास से 6 किमी का ट्रैक करना होता है, जो आपको इस शांत झील और देवदरा के पेड़ से घिरे जंगल के बीच ले आता है। इसी के पास एक छोटा सा मंदिर है, जो देवी बुद्ध नागिन को समर्पित है, यहां के स्थानीय लोग मानते हैं कि उनका वास यहीं सेरेलोसर झील में है।

तीर्थन घाटी हर कदम पर आपको अपनी खूबसूरती से प्रभावित और आश्चर्यचकित करती है। यहां स्थित गांव दर गांव भटकना, ऊंचे-ऊंचे ट्रैक्स करना वाकई मन को सुकून पहुंचाता है। ऐसे ही रोला गांव से जब आप ऊपर की तरफ हाईक करते हुए जाएंगे, तो जंगल के बीच एक सुंदर सी झील पाएंगे। यहां से साउथ की ओर जाने पर आप बड़ी तादात में मोनल बर्ड को देख सकते हैं।

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तीर्थन घाटी में, स्थानीय लोग अभी भी पारंपरिक तरीके से रहते हैं, अपने प्राचीन रीति-रिवाजों को बनाए रखते हैं और स्थानीय मंदिरों के सदियों पुराने रीति-रिवजों का पालन करते हैं और यह देखकर आंखों को अच्छा लगता है। पास के बगी में श्रृंगी ऋषि मंदिर है, जहां ऋषि श्रृंगी की एक सुंदर मूर्ति के साथ बहुत खूबसूरत और इंट्रीकेट वुड कार्विंग की गई है। कहते हैं यह भगवान के 24 अलग-अलग जन्मों को दर्शाती है।

इसके अलावा यहां स्थित सबसे सुंदर जगहों में से एक पाराशर झील भी है, जिसके पास ही एक तीन मंजिला पगोड़ा स्टाइल में बना मंदिर भी है। यह मंदिर और झील ऋषि पाराशर क समर्पित है, जो यहां मेडिटेट करते थे। खाने की बात करें, तो यहां का स्थानीय भोजन मेरे लिए नया और अलग था। मैंने पहली बार यहां सिद्दु और धाम जैसी डेलिकेसीज ट्राई की थीं, जिनका स्वाद आज भी मुंह से गया नहीं है।

कुछ ऐसी है तीर्थन घाटी! जहां एक बार आकर आप वहीं के हो जाएंगे। मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही रहा और मैं आज भी 2017 से हर साल 4-5 दिनों के लिए तीर्थन घाटी जरूर जाती हूं।

लेखक - मनीषा डिमरी

(मनीषा डिमरी ने अपनी पढ़ाई मास कम्युनिकेशन में की है। वह फुल टाइम ट्रैवल और ब्यूटी व्लॉगर हैं। इसके साथ ही दूरदर्शन के साथ फ्रीलांस एंकर के रूप में जुड़ी हुई हैं। )