पितृ पक्ष ,16 दिनों की वह अवधि है जिसमें हिन्दू धर्म के लोग अपने पितरों या पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। पितरों को प्रसन्न करने के लिए पिण्डदान करते हैं एवं जल तर्पण करते हैं। मान्यतानुसार यही वह समय होता है जब पितर धरती पर विचरण करने आते हैं और हमारे द्वारा दिए गए भोजन और जल को ग्रहण करके उन्हें तृप्ति मिलती है। पितृ पक्ष में विशेष तौर पर पितरों का आह्वाहन किया जाता है जिससे वो कल्याण हेतु धरती पर आएं। वैसे तो मान्यता है कि पुरुष ही पितरों की शांति के लिए और तृप्ति के लिए पिंड दान व श्राद्ध करते हैं और उसी से उन्हें मुक्ति भी मिलती है। लेकिन एक प्राचीन कथा के अनुसार महिलाएं भी पितरों का श्राद्ध कर सकती हैं। यह प्रथा रामायण काल से प्रचलित है। इसके बारे में हमें पूरी जानकारी दी अयोध्या के पंडित श्री राधे शरण शास्त्री जी ने। आइए जाने क्या है वो जानकारी और इसकी पूर्ण कथा -

क्या है इसकी कथा 

women pitru paksh ()

पंडित जी के अनुसार पुरुषों के द्वारा ही पिंडदान करने व पितरों का श्राद्ध करने की प्रथा है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियां महिलाओं को भी श्राद्ध करने की अनुमति देती हैं। इसकी प्रचलित कथा रामायण काल में उस समय की है, जब माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ जी के लिए पिंड दान किया था। रामायण में जब वनवास के दौरान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता पितृ पक्ष की अवधि में पिंड दान करने गया पहुंचे। तब श्री राम, श्राद्ध के लिए कोई विशेष सामग्री ढूंढने निकल गए। उसी समय श्राद्ध का मुहूर्त निकलने लगा और श्री राम नहीं पहुंचे। इस बात से चिंतित होकर कि कहीं मुहूर्त न निकल जाए और उनके पूर्वजों को मुक्ति न मिले, माता सीता पिंड दान करने का विचार करने लगीं। उसी दौरान माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए, जो उनसे पिंड दान की कामना कर रहे थे, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि समय से पिंड दान न होने से पितरों को मुक्ति नहीं मिलती है। इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, वटवृक्ष, केतकी फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर फल्गु नदी के किनारे श्री दशरथ जी का पिंडदान कर दिया। इससे राजा दशरथ की आत्मा प्रसन्न हुई और सीताजी को आशीर्वाद दिया। तभी से ये मान्यता है कि पुत्र की अनुपस्थिति में पुत्र वधू पितरों के लिए पिंड दान कर सकती है,जिससे उन्हें सम्पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। लेकिन पंडित जी के अनुसार पुत्री को ये अधिकार प्राप्त नहीं है, क्योंकि विवाहोपरांत उनका कुल अलग हो जाता है। इसलिए उनके द्वारा किया गया तर्पण स्वीकार्य नहीं माना जाता है। उस अवस्था में पुत्री का बेटा यानी नाती अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर सकता है। 

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किन महिलाओं को है श्राद्ध का अधिकार 

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पंडित श्री राधे शरण शास्त्री जी के अनुसार पुराण में कहा गया है कि अगर किसी का पुत्र न हो तो पत्नी ही बिना मंत्रों के श्राद्ध कर्म कर सकती है। पत्नी न हो तो कुल के किसी भी व्यक्ति द्वारा श्राद्ध किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य ग्रंथों में बताया गया है कि परिवार और कुल में कोई पुरुष न हो तो सास का पिंडदान बहू भी कर सकती है (पितृ पक्ष में न करें ये गलतियां )। यदि किसी कारण वश कोई भी कुल का मौजूद नहीं है, तो ब्राह्मण के द्वारा भी किया गया श्राद्ध स्वीकार्य माना जाता है। इसके अलावा विवाहित महिलाओं को ही श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है। पंडित जी कहते हैं विवाहित महिलाएं श्राद्ध के लिए सफेद या पीले वस्त्र धारण कर सकती हैं । ऐसी मान्यता भी है कि महिलाओं को श्राद्ध करते समय कुश धारण नहीं करना चाहिए। यदि श्राद्ध की सम्पूर्ण सामग्री उपलब्ध न हो तब भी पूरी श्रद्धा से रेत के द्वारा बनाए गए पिंड का दान भी पितर स्वीकार कर लेते हैं। 

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महिलाओं को उपर्युक्त बातों का ध्यान रखकर ही पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। तभी उन्हें पूर्वजों के सम्पूर्ण आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। 

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