विंग कमांडर अनुपमा जोशी भारत की उन महिला ऑफिसर्स में शुमार हैं, जिन्होंने 1993 में भारतीय एयरफोर्स जॉइन की थी। इसी समय में भारत सरकार ने महिलाओं को सेना में भर्ती किए जाने की स्वीकृति दे दी थी। अनुपमा जोशी उस समय में काफी चर्चित हुई थीं, जब सेना में लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव पर उन्होंने सवाल उठाए थे। विंग कमांडर अनुपमा ने भारतीय महिला अफसरों के सेना में Permanent Commission के लिए सात साल तक संघर्ष किया था, जिसके बाद महिलाओं के लिए पुरुषों की तरह सेना में Permanent Commission का प्रावधान कर दिया गया था। फिलहाल अनुपमा सहस्त्रधारा खेत्रीय ग्रामीण फाइनेंशियल सर्विस की फाउंडर और सीईओ हैं, जो पहाड़ों के दूर-दराज के गावों में वित्तीय सेवाएं बढ़ाने के लिए काम कर रही हैं। वह दून स्कूल में डायरेक्टर पर्सनल भी हैं। HerZindagi ने अनुपमा जोशी से खास बातचीत की और उनसे जाना कि आजादी के मायने क्या हैं-

HZ: आप महिलाओं के उस पहले बैच से हैं, जिन्होंने एयरफोर्स ज्वाइन की थी। यह सपना कैसे साकार हुआ?

Anupama Joshi: मैं भारत सरकार को इसके लिए धन्यवाद देना चाहूंगी कि उन्होंने महिलाओं के लिए सेना में प्रवेश को स्वीकृति दे दी। हालांकि शुरुआत में यह स्वीकृति 5 सालों की ही थी। यह अविश्वसनीय था, लेकिन यह रास्ता बिल्कुल नया था, इसीलिए इस पर चलने का रोमांच भी बहुत ज्यादा था। 

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HZ: क्या आपको अपने परिवार और भाई-बहनों से सपोर्ट मिला?

Anupama Joshi: हां पूरा सपोर्ट मिला। मेरे पिता इंडियन फॉरेस्ट सर्विस में हैं और उन्होंने अपने मातहत महिलाओं को रिमोट एरिया में काम करते देखा है। मेरे पेरेंट्स भी मेरे फोर्स ज्वाइन करने को लेकर काफी उत्साहित थे, क्योंकि मैं आर्मी में जाने के लिए पैशनेट थी। 

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anupama joshi on women empowerment inside

HZ: आपको महिला होने के आधार पर स्थाई तौर पर सेना में बने रहने की स्वीकृति नहीं मिली। इसके लिए आपको कौन से तर्क दिए गए?

Anupama Joshi: ईमानदारी से कहूं तो कोई भी नहीं। सिर्फ एक ही बात कही गई और वह यह थी कि मेरा चयन शॉर्ट सर्विस के लिए हुआ था। यह सिचुएशन आसान नहीं थी, क्योंकि कोई भी प्रशासन से सवाल नहीं पूछना चाहता था। जो नियम बने हुए थे, सिर्फ उन्हें ही फॉलो किया जा रहा था। 

anupama joshi on achieving success inside

HZ: अक्सर महिलाओं को उनकी सुरक्षा के नाम पर आगे बढ़ने से रोका जाता है और सपोर्ट नहीं किया जाता। क्या इस रक्षाबंधन पर इस सोच में बदलाव लाने की जरूरत है? क्या इस राखी पर महिलाओं को 'बंधन नहीं आजादी' मांगनी चाहिए?

Anupama Joshi: बिल्कुल। महिलाएं पुरुषों के बराबर सामर्थ्यवान हैं। महिलाओं के Permanent Commission के लिए भी मेरा यही तर्क था। मुझे स्थाई सदस्यता लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि मेरी योग्यता के आधार पर मिलनी चाहिए। हमें पुरानी सोच से बाहर आने की जरूरत है, फिर चाहे वह बेटी को लेकर हो, पत्नी के लिए हो, महिला कर्मचारी के लिए हो या फिर किसी और भूमिका में हो। इसीलिए मैं इन काल्पनिक बंधनों से आजादी की मांग करती हूं, जो सिर्फ महिलाओं के लिए बनाए गए हैं। ऐसे बंधन, जो महिलाओं की सोच पर बंदिश लगाते हैं, उनकी पंसद पर बंदिश लगाते हैं। 

HZ: रक्षाबंधन को लेकर आपकी कौन सी खूबसूरत यादें हैं?

Anupama Joshi: रक्षाबंधन पर नए कपड़े पहनने को मिलते हैं, भाई पैसा देते हैं और ढेर सारी मिठाइयां खाने को मिलती हैं। इस मौके पर भाई के साथ अच्छे पल बिताने का मौका मिलता है। ये पल हमेशा यादगार बने रहते हैं। 

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HZ: आपसे प्रेरणा लेने वाली महिलाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

Anupama Joshi: हमेशा खुलकर अपने विचार व्यक्त करें। आप अपनी स्थितियों का आंकलन करें, लेकिन भविष्य में क्या हो जाएगा, इस बात की चिंता में पड़कर आगे कदम बढ़ाने से ना डरें। ऐसा वक्त भी आएगा, जब लोग आपके विचारों को सुनेंगे। खुद पर बंदिशें ना लगाएं, अपने सपने को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाएं। कामों को देरी से करना भी छोड दें और अपने लक्ष्य को पाने की दिशा में सतत प्रयास करती हैं, क्योंकि आपका यही प्रयास आपको मंजिल तक पहुंचाएगा।  

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Image Courtesy: Anupama Joshi