नेटफ्लिक्स की नई फिल्म 'सोनी' में बहुत सहज तरीके से एक महिला के संघर्ष की कहानी दिखाई गई है, लेकिन यह कहानी ऐसी है, जो महिलाओं को सोचने पर मजबूर कर देगी। 'सोनी' के जरिए डेब्यू करने वाले राइटर-डायरेक्टर Ivan Ayr ने आज के समय की एक कर्तव्यनिष्ठ महिला पुलिस इंस्पेक्टर की कहानी दिखाई है और इसी बहाने उन्होंने समाज में महिलाओं के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार को भी प्रभावी तरीके से दिखाया है।

एक बहादुर महिला इंस्पेक्टर की इंस्पायरिंग कहानी 

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सोनी (गीतिका विद्या ओहल्यान) एक कड़क पुलिस इंस्पेक्टर है। दिल्ली में तैनात सोनी अपराध रोकने वाले ऑपरेशन्स का हिस्सा है। सोनी एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा है, जो सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए महिलाओं को तैनात करता है, लेकिन ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाने पर उन्हें सजा देता है। सिस्टम अपने ही अफसरों को बचाने के लिए क्या कदम उठाता है, यही सबसे अहम बात है। यहां भी महिलाओं और पुरुषों के साथ होने वाले व्यवहार में फर्क दिखाया गया है। 

अपराध में शामिल लोग, जो कानून और शासन व्यवस्था को कुछ नहीं समझते, के लिए सोनी काफी सख्त है। अपराधियों को वह खूब सबक सिखाती है, हिंसक भी हो जाती है और इसके लिए उसे कोई पछतावा नहीं होता, चाहें इसके लिए उसे सजा ही क्यों ना दी जाए। कई मौकों पर जब वह पावरफुल लोगों के खिलाफ एक्शन लेती है, तो उसे अपने पद से डिमोट भी कर दिया जाता है, लेकिन अपने साथ होने वाले इस व्यवहार से भी उसका मनोबल कम नहीं होता। 

कल्पना उम्मत (सलोनी बत्रा) सोनी की सीनियर है। वह एक आईपीएस पुलिस ऑफिसर है और ऑपरेशन इन चार्ज है। हालांकि वह रसूखदार और सोनी की तुलना में बड़े पद पर है, लेकिन अक्सर महिलाएं और पुरुष उसके साथ बेरुखी से पेश आते हैं और उसे अहसास कराते हैं कि उसे कैसे बिहेव करना चाहिए और उससे किन चीजों की अपेक्षा होती है। हालांकि कल्पना सबकी सुन लेती है, लेकिन इन चीजों से वह कमजोर नहीं पड़ती और आखिर में वह एक सीनियर पुलिस अफसर के उन्हीं गुणों से लबरेज नजर आती है, जिसकी किसी वरिष्ठ अफसर से उम्मीद की जाती है। 

बंधनों से मुक्ति का रास्ता

सोनी के उलट कल्पना सॉफ्ट तरीके से बात करती है और सही मायने में एक लीडर की तरह पेश आती है। कल्पना के पति संदीप एक सीनियर पुलिस ऑफिसर हैं, जो कल्पना को अक्सर अपने ओहदे के हिसाब से व्यवहार करने की सीख देते हैं। हालांकि वह पुरुषों को मान-सम्मान देने में अपनी तरफ से कमी नहीं रखती, लेकिन अपनी तरफ से सच का साथ देते हुए वह ना सिर्फ दूसरों को आजादी दिलाती नजर आती है, बल्कि इस सफर में वह खुद भी अपने बंधनों से आजाद हो जाती है। 

ये दोस्ती है बेमिसाल

कल्पना और सोनी दोनों ओहदे के हिसाब से सीनियर और जूनियर हैं, लेकिन ऑफिस से बाहर दोस्त हैं। कल्पना सोनी के घर अक्सर आती है, ऑपरेशन्स के बीच में दोनों चाय और खाना साथ में खाते हैं। कल्पना सोनी के लिए सपोर्टिव है और अपने पति संदीप (मोहित चौहान) के सामने सोनी के एक्शन का बचाव करती नजर आती है। यही नहीं, जब सोनी परेशान होती है, तो वह उसे सिचुएशन्स के हिसाब से कई संकेतों और प्रतीकों से समझाती है मसलन जब सोनी के साथ बदसलूकी के दौरान उसके हाथ में चोट लग जाती है, तो कल्पना उसे अमृता प्रीतम का उदाहरण पेश करती है। अमृता प्रीतम के लिए किसी शायर ने मजाक उड़ाते हुए कहा था कि उनकी कहानी पर किताब लिखने की क्या जरूरत, रसीदी टिकट ही उसके लिए काफी है। इस उदाहरण के जरिए कल्पना सोनी को समझाना चाहती थी कि शायर ने अमृता प्रीतम को भले ही खारिज करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने अपनी लेखनी से अपना मुकाम खुद हासिल कर लिया और इसीलिए उसे भी खुद को कमजोर समझने की जरूरत नहीं है।

क्राइम अगेंस्ट वुमन की हकीकत दिखाती फिल्म 

सोनी की अपने पति नवीन (विकास शुक्ला के साथ बातचीत वाले सीक्वेंस को ज्यादातर इस तरह फिल्माया गया है कि उसमें कोई डायलॉग ही नहीं हैं। सोनी अपने पति से जब बात करती है, तो उसकी तरफ देखती भी नहीं। वहीं हुमा (गौरी चक्रबर्ती) और मम्मी जी (मोहिंदर गुजराल) जैसे किरदार सोनी और कल्पना से आदर्श महिला बनने की डिमांड करते रहते हैं। हालांकि उनकी बातों का सोनी और कल्पना पर असर नहीं होता, लेकिन वो अपनी बातें बार-बार दोहराती रहती हैं। यह फिल्म पूरी तरह से हकीकत बयां करती नजर आती है, फिर चाहें वह महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादती की बात हो या फिर उनके साथ होने वाला दोयम दर्जे का व्यवहार, सबकुछ रीयल नजर आता है। फिल्म में डायलॉग कम से कम रखे गए हैं। फिल्म में आसपास का एंबियंस भी ऐसा दिखाया गया है, जिससे आसानी से रिलेट किया जा सकता है। ऑन लोकेशन शूटिंग की वजह से यह फिल्म और भी ज्यादा इंपेक्टफुल नजर आती है। बैकग्राउंड साउंड भी नहीं है। सोनी को रेडियो सुनते दिखाया जाता है, जिससे पता चलता है कि दुनिया महिला सेफ्टी को किस तरह से लेती है- निगरानी बढ़ाने और महिलाओं के लिए अलग बसें चलाने जैसे प्रयासों की बात सुनाई देती है। इससे सोनी की कहानी पर से ध्यान कहीं और नहीं भटकता।

यह फिल्म एक ऐसा सोशल ड्रामा है, जिससे देश की हर महिला सबक ले सकती है और अपने भीतर सोनी और कल्पना जैसा जज्बा पैदा कर सकती है और समाज में आज भी कायम कुरीतियों का मुंहतोड़ जवाब दे सकती है। इस फिल्म को 75वें वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया था और वहां इसकी काफी सराहना की गई थी।  

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