इस साल रक्षाबंधन को हम स्वतंत्रता दिवस के साथ पूरे हर्षोउल्लास के साथ मना रहे हैं और इसी के मद्देनजर HerZindagi महिलाओं के लिए स्पेशल कैंपेन चला रहा है #Bandhannahizadi, जिसकी मूल भावना यही है कि महिलाएं हर बंधन से आजाद होकर अपनी जिंदगी खुलकर जिएं और अपनी लाइफ में जो हासिल करना चाहती हैं, उसके लिए जी-जान से मेहनत करें और कामयाबी हासिल कर सकें। महिलाओं को इंस्पायर करने के लिए हम लाए हैं कुछ रियल लाइफ इंस्पिरेशनल स्टोरीज, जिनसे ना सिर्फ महिलाओं का हौसला बढ़ेगा, बल्कि आगे बढ़ने के लिए वे प्रेरित भी महसूस करेंगे। आज हम इंस्पिरेशनल वुमन संगीता गौड़ से महिलाओं की आजादी और बंधनों के बारे में चर्चा करेंगे। संगीता गौड़ ने घर और बाहर बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हर मुश्किल का उन्होंने डटकर सामना किया। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और हाल ही में पीसीएसजे की परीक्षा क्वालीफाई कर जज बन गईं। संगीता गौड़ के इंस्पिरेशनल विचारों के बारे में आइए जानते हैं-

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सवाल: क्या अब रक्षाबंधन के बारे में नए नजरिए से सोचने का वक्त आ गया है? 

पहले के समय में महिलाएं अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती थीं और यह सोच होती थी कि भाई बहन की रक्षा करेगा, वे चीजें उस समय में सही थीं, लेकिन अब समय बदल गया है। अब भाइयों को अगर मदद करनी ही है, तो उनकी उनकी एजुकेशन में हेल्प करें, करियर को बेहतर बनाने में मदद करें। आज के समय में ऐसी बड़ी बहनें भी हैं, जो छोटे भाइयों को सपोर्ट करती हैं। वर्तमान समय में भाई-बहन के रिश्ते पहले से ज्यादा बेहतर हैं। भाई-बहन एक दूसरे को ज्यादा सपोर्ट करते हैं, एक दूसरे की फीलिंग, पसंद और इमोशन को समझते हैं।

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sangeeta gaur became judge inside

सवाल: आपकी नजर में महिलाओं की आजादी के क्या मायने हैं?

आज के समय में महिलाओं की आजादी का मतलब यही है कि वे अपनी पसंद के काम कर सकें। अपनी पसंद का लाइफ पार्टनर चुन सकें। महिलाओं ने पिछले कुछ सालों में काफी प्रोग्रेस की है, लेकिन अभी भी महिलाएं अपनी फैमिली पर काफी ज्यादा निर्भर हैं। महिलाएं समाज से तो संघर्ष कर सकती हैं, लेकिन घरवालों को समझाना उनके लिए आसान नहीं होता। इसके लिए हिम्मती होने की जरूरत होती है। महिलाओं को बचपन से सिखाया जाता है कि उन्हें एडजस्ट करना है, किसी भी माहौल के हिसाब से खुद को ढालना है। महिलाओं को बचपन से आजादी नहीं मिली होती, इसीलिए वे अपनी चीजों को पाने के लिए खुद को पहले रखने की बात समझ नहीं पाती। इसी स्थिति को बदलने की जरूरत है, तभी महिलाएं सशक्त हो सकती हैं। 

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सवाल: महिलाएं इमोशनल बंधनों से कैसे आजाद हो सकती हैं?

महिलाएं जिस दिन खुद से प्यार करने लगेंगी, उसी दिन वे बंधनों से आजाद हो जाएंगी। घरवालों और अपने प्रियजनों की चॉइस और खुशी महिलाओं के लिए ज्यादा मायने रखती है। इमोशनल बाउंडेशन हर महिला की जिंदगी में होती हैं, महिला इनसे कई बार टूटती है। लेकिन उसे आगे बढ़ना है तो उठ खड़े होना होगा। महिलाएं घर-परिवार के लिए पूरी तरह से डेडिकेटेड होती हैं। उन्हें परिवार और समाज की दुहाई देकर इमोशनली वीक करने की कोशिश की जाती है। मैं यही कहूंगी कि अगर महिलाएं अपने लिए काम करना चाहती हैं, तो उन्हें इस बारे में जरूर सोचना चाहिए। अपने लिए कुछ करने का वक्त है, तो वह अभी है। जब आप अपनी स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करेंगी, तभी आप सशक्त होकर आगे बढ़ सकती हैं।  

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सवाल: आपको अपनी जिंदगी में कौन से संघर्षों का सामना करना पड़ा?

मैंने अपनी लाइफ में काफी स्ट्रगल देखे। मैं देवरिया के बबनी गांव की रहने वाली हूं। मैं टिपिकल कोर्स नहीं करना चाहती थी, जर्नलिस्ट बनना चाहती थी। घरवालों ने मुझे मना किया और मैंने खुद को समझा लिया। मैं तीन बहनों में सबसे बड़ी थी, मुझ पर शुरू से ही शादी का दबाव था। लेकिन मैं शादी नहीं करना चाहती थी। शादी के बारे में लगातार बात होना, लड़के वालों का घर आना, इन चीजों से दूर जाने के लिए मैंने बीएचयू में एलएलबी में एडमिशन ले लिया। इस दौरान काफी मुश्किल हुई। कई बार सुविधा होते हुए भी स्ट्रेस की वजह से भूखी रही। हॉस्टल में कोई आपके लिए करने वाला नहीं होता। आप अपनी फैमिली को छोड़कर बाहर रह रहे होते हैं, अपनी हर चीज के लिए जिम्मेदार भी खुद ही होते हैं। 

इसके बाद मैंने वकालत की, जो मेरे लिए काफी मुश्किल थी। मैंने कड़कड़डूमा कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। मैंने जल्दी-जल्दी काम सीखा। मैंने सोचा कि बार में रहते हुए अच्छा काम किया, लेकिन मैं जज बनकर और ज्यादा अच्छा कर सकती हूं। घर से शादी के लिए लगातार दबाव बना हुआ था। उस दौरान मेरी शादी के लिए लड़के देखे जा रहे थे, लेकिन लड़कों की तरफ से ना हो जाती थी, क्योंकि उन्हें मेरे लॉ करने से ऐतराज था। बहुत से परिवारों ने कहा कि उन्हें कानून पढ़ी हुई बहू नहीं चाहिए। मेरी वकालत को कोई सपोर्ट नहीं कर रहा था। मुझे इस बात को लेकर गुस्सा था कि मेरी फैमिली सपोर्ट नहीं कर रही थी। घरवालों के प्रेशर के आगे मैं टिपिकल अरेंज मैरिज करने को तैयार थी। इसी दौरान मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आ गई और यहां रहकर मैंने तैयारी की। इसी दौरान मैंने पीसीएस की परीक्षा दी और खुशकिस्मती देखिए कि मैंने यह परीक्षा पास कर ली। यह परीक्षा पास करने के बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल गईं। जज बनने के बाद मेरी फैमिली मेरे लिए सपोर्टिव हो गई। अब मेरा मन है कि अच्छे फैसले दूं, लोगों के साथ न्याय करूं और आगे चलकर हाईकोर्ट में भी जाऊं।

आजादी के जश्न के बीच आप महिलाओं को कामयाब होने के लिए क्या संदेश देना चाहेंगी?

मैं महिलाओं से यही कहना चाहूंगी कि अपनी लाइफ में जो करना चाहती हैं, उसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ रहें। लड़कियों के लिए 10वां या 12वीं की पढ़ाई में ही बहुत सोच-विचार शुरू हो जाता है। स्कूल बहुत दूर ना हो,  बहुत पैसा ना खर्च हो जैसी कई चीजें फैमिली वाले सोचते हैं। लेकिन यह लड़कियों को देखने की जरूरत है कि उनके लिए क्या चीज सही है। जो करियर आप चूज करना चाहते हैं, जो लाइफ पार्टनर आप चुनना चाहते हैं, उसके बारे में फैमिली को बताएं। शादी महिलाओं की जिंदगी का एक अहम पड़ाव है, लेकिन यह कोई हौवा नहीं है। शादी कभी भी महिलाओं की जिंदगी में आने वाली बाधा नहीं है। मैंने हमेशा चाहा कि मैं ऐसे व्यक्ति से शादी करूं, जो मुझे सपोर्ट करे, मेरी फीलिंग को समझे। अगर कोई महिलाए क्रिएटिव है या बिजनेस करना चाहती है, तो वह अपनी फैमिली को इस बारे में बताए। महिलाओं को यह बात समझनी चाहिए कि अगर वे एक बार समझौता कर लेती हैं, तो उन्हें हर बार समझौता करना पड़ता है। आप उतना ही करें, जितना स्वाभाविक रूप से आपके लिए सहज है। घरवालों और समाज के बारे में सोचते-सोचते महिलाएं अपनी इच्छाओं के विपरीत चली जाती हैं और तनाव में आ जाती हैं और उन्हें इस बारे में पता भी नहीं चलता। बहुत सी स्थितियां आपको पीछे खींचने की कोशिश करते हैं। लेकिन इससे घबराएं नहीं, पूरे हौसले के साथ आगे बढ़ें और मुश्किलों का डटकर सामना करें। अपनी तरफ से कोशिश करें कि अपनी फैमिली को साथ लेकर चलें, क्योंकि अगर परिस्थितियां आपके हक में नहीं हैं तो आपके प्रयासों से एक दिन बदल भी सकती हैं।