हिन्दू पुराणों के अनुसार हर महीने 2 एकादशी की तिथियां होती हैं, यानी कि साल के 12 महीनों में 24 एकादशी होती हैं। हर महीने की एकादशी  तिथि का और उसमें व्रत करने का अलग महत्त्व है। हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना गया है। कार्तिक माह में पड़ने वाली रमा एकादशी का अलग ही महत्त्व है। कार्तिक का महीना 1 नवंबर से प्रारम्भ हो चुका है। इस महीने की रमा एकादशी को मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। इस वर्ष रमा एकादशी 11 नवंबर, बुधवार को पड़ रही है। आइए जानें कब है रमा एकादशी, इसकी कथा, पूजा का शुभ मुहूर्त और इसका महत्व।

रमा एकादशी का महत्व 

हिन्दू धर्म की मान्यतानुसार रमा एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है साथ ही किसी तरह की कोई आर्थिक परेशानी भी नहीं होती है। लोककथाओं के अनुसार, रमा एकादशी पूर्ण रूप से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित होता है, विष्णु जी का एक अवतार श्री राम का भी है, इसलिए उन्हें राम जी की तरह भी पूजा जाता है। जो व्यक्ति इस व्रत को करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। 

रमा एकादशी की कथा 

rama ekadshi

इस दिन के पीछे की कहानी यह है कि एक नगर में मुचुकुंद नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनकी चंद्रभागा नाम की एक पुत्री थी। राजा ने अपनी बेटी का विवाह राजा चंद्रसेन के बेटे शोभन के साथ कर दिया। शोभन एक समय भी बिना खाए नहीं रह सकता था। शोभन एक बार कार्तिक के महीने में अपनी पत्नी के साथ अपने ससुराल गया तभी रमा एकादशी आ गयी। चंद्रभागा के गृह राज्य में सभी इस व्रत का श्रद्धा से पालन करते थे इसलिए शोभन को भी यह व्रत रखने के लिए कहा गया। शोभन इस बात को लेकर चिंतित हो गया कि वह तो एक पल भी भूखा नहीं रह सकता, फिर वह रमा एकादशी का व्रत कैसे करेगा। इसी चिंता के साथ वह अपनी पत्नी के पास गया और कुछ उपाय निकालने को कहा। इस पर चंद्रभागा ने कहा कि अगर ऐसा है तो आपको राज्य से बाहर जाना पड़ेगा, क्योंकि राज्य में कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस व्रत का पालन ना करता हो। यहां तक कि जानवर भी इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करते हैं। 

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शोभन ने राज्य से बाहर जाने की बजाय व्रत रखना स्वीकार कर लिया। अगले दिन शोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और अत्यंत दुर्बल होने की वजह से वह भूख और प्यास बर्ताश्त नहीं कर सका और उसने अपने प्राण त्याग दिए। चंद्रभागा इस शोक में सती होना चाहती थी किन्तु उसके पिता ने यह कहा कि वह ऐसा ना करे और भगवान विष्णु पर भरोसा रखे। चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई और अपने पिता के घर रहकर एकादशी का व्रत करने लगी। उधर रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। इस प्रकार चंद्रभागा जब पति शोभन से मिली तो उसने कहा कि  हे स्वामी अब आप मेरे पुण्य को सुनिए जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी तब ही से मैं सविधि एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक उस नगर में रहने लगी। 

रमा एकादशी पूजा का शुभ मुहूर्त

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एकादशी तिथि आरंभ- 11 नवंबर 2020, बुधवार, प्रातः 03 बजकर 22 मिनट से

एकादशी तिथि समाप्त- 12 नवंबर 2020, बृहस्पतिवार ,रात्रि 12 बजकर 40 मिनट तक

एकादशी व्रत पारण तिथि- 12 नवंबर 2020, बृहस्पतिवार, प्रातः 06 बजकर 42 मिनट से 08 बजकर 51 मिनट तक

द्वादशी तिथि समाप्त- 12 नवंबर 2020, बृहस्पतिवार, रात्रि 09 बजकर 30 मिनट तक

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कैसे करें पूजन

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  • वैसे तो यह व्रत एकादशी तिथि को रखा जाता है लेकिन नियमों का पालन इससे एक दिन पूर्व यानी कि दशमी तिथि से ही करना चाहिए। इसलिए दशमी तिथि को पूरे दिन प्याज और लहसुन तथा मांस मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन सूर्यास्त के बाद से भी भोजन ग्रहण न करें। कहा जाता है कि एकादशी के दिन पेट में अन्न का एक भी दाना मौजूद न  हो , इसलिए दशमी के दिन से ही व्रत का पालन शुरू कर देना चाहिए। 
  • व्रत के दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएं और स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु की अराधना करें।
  • फिर विष्णु जी के सामने दीप-धूप जलाएं। फिर उन्हें फल, फूल, नैवेद्द अर्पित करें।
  • मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु को तुलसी जरूर चढ़ाएं क्योंकि तुलसी को विष्णु प्रिया माना जाता है। लेकिन ध्यान रहे कि तुलसी को एकादशी के दिन न तोड़ें बल्कि पहले से ही तुलसी की तोड़ी हुई पत्तियों को अर्पित करें। 
  • एकादशी को अन्न का सेवन न करें। जहां तक हो सके इस दिन निर्जला व्रत का पालन करें या फलाहारी व्रत करें। द्वादशी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएं और स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन करें। 

इस प्रकार रमा एकादशी का व्रत करने एवं नियमों का पालन करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा दृष्टि प्राप्त होती है और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। 

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