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भारत की वो जगहें जहां पर नहीं मनाया जाता होली का त्यौहार, जानें वजह

भारत में एक नहीं बल्कि ऐसी कई जगहें हैं जहां होली का त्यौहार किसी न किसी वजह से नहीं मनाया जाता है। आइए इन जगहों के बारे में जानते हैं।
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रंगों का त्योहार यानि होली को लेकर भारत के लगभग हर हिस्से के लोग अच्छे-खासे उत्सुक रहते हैं। इस बार होली वीकेंड में होने के चलते लोगों के अंदर और भी अधिक उत्साह है। ऐसे में लगभग हर राज्य होली का त्यौहार धूमधाम से मनाने के लिए तैयार है। इस साल देश के लगभग सभी हिस्से में 18 मार्च को होली मनाई जाएगी। लेकिन क्या आपको मालूम है कि भारत में कुछ ऐसी भी जगहें हैं जहां होली का त्यौहार मानना बुरा संकेत माना जाता है। 

जी हां, भारत में कुछ ऐसी जगहें हैं जहां होली नहीं मनाई जाती हैं। भारत की इन जगहों पर होली के दिन भी दूसरे सामान्य दिनों की तरह रहता है। जिन जगहों पर होली नहीं मनाई जाती हैं उसके पीछे कई वजहे भी बताई जाती है। आज इस आर्टिकल में हम आपको भारत की उन जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां होली नहीं मनाई जाती है और उसकी वजह भी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं।

कसमार ब्लॉक 

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कसमार एक ऐसी जगह है जहां आज से नहीं बल्कि कई वर्षों से होली नहीं मनाई जाती है। होली नहीं मनाने के पीछे लोककथा है कि लगभग 100 साल पहले एक राजा की एक बेटी की मौत होली के दिन ही हो गई थी। इतना ही नहीं, इस घटना के तुरंत बाद राजा ने भी दम तोड़ दिया था। ऐसा माना जाता है कि मौत से पहले राजा ने लोगों से कहा था कि होली नहीं मानना। तब से यहां होली नहीं मनाई जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कसमार ब्लॉक झारखण्ड के बोकारो शहर में मौजूद है।

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रामसन गांव 

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भारत के पश्चिम में एक ऐसी जगह है जहां लगभग 2 सौ साल से होली नहीं मनाई जाती है। इस गांव में होली नहीं मनाने के पीछे बेहद ही दिलचस्प कहानी है। होली नहीं मनाने के पीछे ये लोककथा है कि प्राचीन काल से इस जगह पर संतों का अभिशाप लगा हुआ है। कहा जाता है कि कई संतों के साथ उस समय के राजा ने बेहद ही बुरा दुर्व्यवहार किया था। (होली संदेश) इसलिए गांव के लोग होली मनाने से डरते हैं। आपको बता दें कि रामसन गांव गुजरात में है।

क्विली और कुरझन गांव 

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क्विली और कुरझन गांव में होली नहीं मानने के पीछे भी कहानी बेहद दिलचस्प है। लोककथा ने अनुसार इन दोनों गांव की रक्षा देवी त्रिपुरा करती है। कहा जाता है कि त्रिपुरा देवी को अधिक शोर पसंद नहीं है। इसलिए इन दोनों गांव में होली नहीं मनाई जाती है। लोगों का मानना है कि क्विली और कुरझन गांव में पिछले सौ साल से भी अधिक समय से पहले होली नहीं मनाई जा रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये दोनों ही गांव देवभूमि यानि उत्तराखंड में हैं।

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तमिलनाडु 

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ये तो हम सभी जानते हैं कि उत्तर-भारत और दक्षिण भारत के एक नहीं बल्कि कई रीति-रिवाज आपस में मेल नहीं खाते हैं। कुछ ऐसा ही होली के शुभ अवसर पर देखा जाता है। कहा जाता है कि होली के दिन यहां के कुछ लोग होली न मनाकर स्थानीय पर्व मासी मागम मनाकर इसे सम्मान देते हैं। (होली का इतिहास और महत्व) इस खास मौके पर तमिलनाडु के लोग कई लोगों का मानना है कि इस दिन आकाशीय जीव धरती पर उतरते हैं।

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Image Credit:(@freepik)

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