हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। प्रत्येक महीने में दो बार एकादशी तिथि होती है पहली कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार पूरे साल में 24 एकादशी तिथियां होती हैं जिनका अपना अलग महत्व है। जिस प्रकार सभी एकादशी तिथियों का अलग मह्त्व बताया गया है उसी तरह पौष महीने की एकादशी तिथि का भी अलग महत्व बताया गया है।

पौष महीने में पड़ने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है और पुत्र प्राप्ति की इच्छा और संतान की रक्षा के लिए यह एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुत्रदा एकादशी साल में दो बार होती है। पहली पौष माह में और दूसरी सावन माह में। आइए अयोध्या के पंडित राधे शरण शास्त्री जी से जानें इस साल पौष महीने की एकादशी कब मनाई जाएगी और इसका क्या महत्व है।

पौष पुत्रदा एकादशी तिथि और शुभ मुहूर्त 

shubh muhurat putrada ekadashi

  • इस साल पौष महीने में एकादशी तिथि 13 जनवरी गुरूवार को मनाई जाएगी। 
  • एकादशी तिथि आरंभ- 12 जनवरी, बुधवार, सायं 04: 49 मिनट से 
  • एकादशी तिथि समाप्त-13 जनवरी, गुरुवार सायं 07: 32 मिनट तक 
  • चूंकि उदया तिथि के अनुसार यह व्रत 13 जनवरी को रखा जाएगा इसलिए इसी दिन व्रत और पूजन फलदायी होगा। 
  • इस व्रत का पारण 14 जनवरी, बुधवार को किया जाएगा।  

पौष पुत्रदा एकादशी पूजा विधि 

putrada ekadashi puja vidhi

  • यदि आप ये व्रत रखने जा रहे हैं तो दशमी तिथि के दिन से ही सूर्यास्त से पहले भोजन कर लें और तामसिक भोजन न करें। 
  • एकादशी तिथि के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं और व्रत का संकल्प लें। 
  • घर के मंदिर के सभी भगवानों को स्नान कराएं और नए या साफ़ वस्त्रों से सुसज्जित करें। 
  • इस दौरान भगवान को धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, फूल माला और नैवेद्य अर्पित करें और पुत्रदा एकादशी व्रत कथा पढ़ें। 
  • इसके बाद विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रमका पाठ करें। 
  • इस दिन संतान प्राप्ति की इच्छा हेतु भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है।
  • उन्हें पीले फल, तुलसी, पीले पुष्प और पंचामृत आदि अर्पित करें। 

पुत्रदा एकादशी की कथा

putrada ekadashi katha

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भद्रावती राज्य में सुकेतुमान नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी शैव्या थी। राजा के पास सबकुछ था सिर्फ संतान नहीं थी। ऐसे में राजा और रानी उदास और चिंतित रहा करते थे। राजा के मन में पिंडदान की चिंता सताने लगी। ऐसे में एक दिन राजा ने दुखी होकर अपने प्राण लेने का मन बना लिया, हालांकि पाप के डर से उसने यह विचार त्याग दिया। राजा का एक दिन मन राजपाठ में नहीं लग रहा था, जिसके कारण वह जंगल की ओर चला गया। राजा के मन में बुरे विचार आने लगे। इसके बाद राजा दुखी होकर एक तालाब किनारे बैठ गए। तालाब के किनारे ऋषि मुनियों के आश्रम बने हुए थे। राजा आश्रम में गए और ऋषि मुनि राजा को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि राजन आप अपनी इच्छा बताएं । राजा ने अपने मन की चिंता मुनियों को बताई और मुनियों ने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने को कहा। राजा वे उसी दिन से इस व्रत को रखा और द्वादशी को इसका विधि-विधान से पारण किया। इसके फल स्वरूप रानी ने कुछ दिनों बाद गर्भ धारण किया और नौ माह बाद राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से यह व्रत प्रचलन में आया। 

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पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व 

पौष एकादशी का व्रत संतान की लंबी आयु और संतान प्राप्ति की कामना करने वाले दम्पत्तियों के लिए विशेष रूप से फलदायी होता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करने से सभी पापों से मुक्ति मिलने के साथ मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यही नहीं इस दिन पूजन करने से संतान का स्वास्थ्य भी ठीक बना है और संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है। 

इस प्रकार पौष महीने की पुत्रदा एकादशी तिथि विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है और इस व्रत को करने से समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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