रेप..... ये एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में सोचकर ही डर लगता है। जिसपर ये बीतता है उसके दुख और तकलीफ का अंदाज़ा ही नहीं लगाया जा सकता है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग इसे महज एक शब्द की तरह लेते हैं और ये नहीं सोच सकते कि आखिर इसका असर किस हद तक किसी व्यक्ति पर पड़ सकता है। ये सोचकर और भी ज्यादा डर लगता है कि किसी नाबालिग के साथ ऐसी कोई घटना हुई है या वो नाबालिग ही हैं जो ऐसी किसी घटना को अंजाम देते हैं या उसके बारे में सोचते हैं। हो सकता है आपको ये समझ न आ रहा हो कि मैं क्या कह रही हूं, लेकिन अब जो मैं आपको बताने जा रही हूं उससे शायद आपको भी सिहरन हो।

इंस्टाग्राम पर #boislockerroom नाम से एक ग्रुप बनाया गया था। ये ग्रुप दिल्ली के क्लास 11-12 के लड़कों ने मिलकर बनाया था और यकीनन 11-12 में पढ़ने वाले लड़कों की उम्र 18 - 19 से ज्यादा तो हो नहीं सकती। कुछ तो 16 साल के भी होंगे। इस ग्रुप में जो बातें होती थीं उनके कारण सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया है। नाबालिग लड़के भी अपनी ही उम्र की लड़कियों से अश्लील तस्वीरें मांगते थे, उनके बारे में अभद्र टिप्पणियां करते थे और साथ ही साथ उन्हें रेप करने की प्लानिंग भी करते थे। इस ग्रुप में जो बातें होती थीं उसके स्क्रीन शॉट्स लगातार वायरल हो रहे हैं। इसपर आपत्ती भी दर्ज करवाई जा चुकी है और दिल्ली महिला आयोग की तरफ से लिखित में इंस्टाग्राम और दिल्ली पुलिस को शिकायत भी दर्ज करवाई जा चुकी है।

रिपोर्ट के अनुसार इस ग्रुप के सभी प्रतिभागी टीनएज हैं और यही नहीं जिन लड़कियों के खिलाफ ये सब होता था और जिनकी मॉर्फ्ड तस्वीरें वायरल होती थीं, जिनके रेप की प्लानिंग डिसकस होती थी वो भी नाबालिग ही थीं। मैं कुछ भी कहने से पहले आपको बता दूं कि नाबालिगों की अभद्र तस्वीरें लीक करना, उन्हें वायरल करना या उनके साथ किसी भी तरह की यौन शोषण की घटना को अंजाम देना कानूनन अपराध है।

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ये मामला यहीं नहीं रुका....

जब इस चैट ग्रुप की बातें सामने आईं तो इसके मेंबर्स ने और भी ज्यादा गिरी हुई हरकत की। एक ट्विटर यूजर की ट्वीट के मुताबिक इन लड़कों ने एक दूसरे ग्रुप में उन लड़कियों की न्यूड तस्वीरें लीक करने की प्लानिंग की जिन्होंने इस ग्रुप के खिलाफ शिकायत की थी और अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में ये स्क्रीनशॉट लगाए थे।



दिल्ली पुलिस का कहना है कि इनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा। महिला आयोग ने तो शिकायत दर्ज करवा ही दी है।



ऐसा नहीं है कि इन लड़कों को ये नहीं पता था कि ये लड़कियां अंडरएज हैं। इसके बारे में भी उन्हें पूरी जानकारी थी।

 

ये सब 'आम बात' नहीं हो सकती-

जहां एक ओर ये स्क्रीन शॉट्स सोशल मीडिया पर कोहराम मचाए हुए हैं वहीं दूसरी ओर इनके बारे में कई सोशल मीडिया यूजर्स का ये कमेंट भी है कि ये तो 'आम बात' है। 'लड़कों ने रेप किया तो नहीं', 'लड़कियों ने भी कुछ किया ही होगा', 'तस्वीरें तो लड़कियों ने ही भेजी होंगी'... ये वो कुछ बातें हैं जो सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं। मैं उन्हें कड़े शब्दों में समझा दूं कि ये आम बात नहीं हो सकती है। विक्टिम पर आरोप लगाने की तो समाज की पुरानी आदत रही है, लेकिन जो लोग रेप को आम बात कह रहे हैं वो गलत है। और रेप कभी आम बात नहीं हो सकता है।

जिस आधार पर लोग कह रहे हैं कि 'ऐसा तो अक्सर होता है', 'ऐसे ग्रुप्स तो सबके होंगे' वो समाज की एक गहन चिंता को सामने रखता है। भला कैसे रेप आम बात हो सकती है। किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करना क्या आम है?

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कब छूटेगी विक्टिम ब्लेमिंग-

'लड़कियों ने ही तस्वीरें भेजी होंगी, लड़कियां भी कम नहीं होतीं, कुछ तो दूसरी तरफ से भी हुआ होगा, आखिर यही लड़कियां क्यों, ताली एक हाथ से थोड़ी ही बजती है', ये सब बातें विक्टिम ब्लेमिंग की ओर इशारा करती हैं जो हमारे समाज में हर दूसरे इंसान के साथ होता आया है। अरे समाज की हालत तो देखिए कि अगर शादी के बाद किसी लड़की का पति मर जाता है तो उसे भी अपशगुनी कहा जाता है, लेकिन ऐसा करना हमारी विक्टिम ब्लेमिंग की मानसिकता को दिखाता है। रेप जैसा मुद्दा, अभद्र भाषाओं में लड़कियों को प्रताड़ित करना क्या उस देश को शोभा देता है जहां संस्कृति को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं।

मुझे आज भी याद है वो समय जब रेप के मामले में यूपी के एक नेता ने कहा था, 'लड़कों से गलती हो जाती है, लड़के तो लड़के ही होते हैं', यही मानसिकता है जिसकी वजह से आज दिल्ली के पॉश इलाके के उन लड़कों को बचाया जा रहा है। ये बात सिर्फ दिल्ली की नहीं बल्कि पूरे देश की है जहां महिलाएं और लड़कियां कई बार बाहर निकले से भी डरती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके साथ कुछ भी हो सकता है। यहां बात उस समाज की हो रही है जिसे महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है। सड़क पर सोती हुई एक बच्ची हो या फिर पॉश इलाके में बड़े घर में रहने वाली कोई लड़की। डर सबके लिए बड़ा हो गया है।

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ऑनलाइन हैरेस्मेंट को कम मत समझिए-

यहां एक और बात जो सोचने वाली है वो ये कि लोग कह रहे हैं, 'रेप हुआ तो नहीं न, सिर्फ ऑनलाइन ही तो बोला था..', इंटरनेट के इस दौर में जहां एक फेक न्यूज दंगे करवा सकती है, जहां एक वॉट्सएप फॉर्वर्ड के कारण लिंचिंग जैसा गंभीर जुर्म किया जा सकता है वहां ऑनलाइन हैरेस्मेंट को कम क्यों आकां जा रहा है? सिर्फ इसलिए क्योंकि ये लड़कियों के साथ हो रहा है और हमारे यहां तो उन्हें बोलने का कोई अधिकार ही नहीं होता।

उस ग्रुप की चैट में कहा गया था कि 'जो लड़कियां ज्यादा फेमेनिस्ट बन रही हैं उनकी तस्वीरें वायरल करो'.. इसके साथ गालियों का प्रयोग भी किया गया था। एक अहम सवाल जो पूछने योग्य है वो ये कि क्या फेमेनिस्ट शब्द गाली है? क्या फेमेनिस्ट बनना या महिलाओं के बारे में सोचना या सिर्फ अपने अधिकारों के बारे में लड़ते हुए जो गलत है उसे रिपोर्ट करना कोई अपराध है? जिस हिसाब से फेमेनिस्ट शब्द को गलत आंका जाता है वो भी एक बड़ी बहस का विषय है।



पर मैं आपको ये जरूर बता दूं कि ये सब कुछ आम नहीं है और ये समाज का एक सिरदर्द है कि ऐसे मुद्दों को आम समझा जाता है। इनपर ध्यान नहीं दिया जाता। ये मुद्दा उठा और सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ग्रुप के लड़कों ने किसी और नाम से यूजरनेम बना लिया होगा क्योंकि अब उनमें से कोई मिल नहीं रहा। सोशल मीडिया पर ये अभी ट्रेंड भी हो रहा है, लेकिन शायद कुछ समय में खत्म हो जाए और जो दोषी हैं वो इससे भी बड़े किसी जुर्म को अंजाम दें। जो दोषी हैं उन्होंने जो किया उसकी सजा उन्हें मिलनी चाहिए, लेकिन उनका क्या जो विक्टिम ब्लेमिंग कर, उन दोषियों के द्वारा किए गए काम की सफाई देकर उनके अपराध को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।



ये अपने आप में एक अपवाद है कि हमारे देश में सेक्स की बातों को लेकर मुंह-नाक सिकोड़े जाते हैं और इन्हें अभद्र कहा जाता है, सेक्स एजुकेशन के नाम पर चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन रेप की बात करते ही और रेपिस्ट की बात करते ही उसे डिफेंड किया जाने लगता है और इसमें किसी को कोई तकलीफ नहीं होती। इसे आम समझा जाता है। क्या ये वाकई आम हो सकता है? खुद से एक सवाल करिए कि अगर स्कूल जाने वाले बच्चे जिन्हें उच्च शिक्षा मिलती है वो ऐसी बातें करेंगे और ऐसी हरकतों पर उतर आएंगे तो आगे क्या होगा, किस बुनियाद पर हम ये कह सकते हैं कि हम एक बेहतर भविष्य बना रहे हैं, क्या उस भविष्य में महिलाओं की सुरक्षा जरूरी नहीं है?

ये सोचने वाली बात है कि हम कब तक ऐसी घटनाओं को आम समझते रहेंगे।

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