जीवन के शुरूआती दिनों में बच्चा सबकुछ अपने माता-पिता से सीखता है। यहां तक कि अपना स्लीपिंग पैटर्न भी। दरअसल, जब एक शिशु जन्म लेता है तो उसके सोने का तरीका भी अपने पैरेंट्स से काफी अलग होता है। आपने देखा होगा कि शिशु जन्म के बाद शुरूआती दिनों में दोपहर में सोता है और कई बार रात में जागता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी वह सोते हुए जल्दी उठ जाता है और फिर उसे जल्दी नींद नहीं आती।

इस तरह, बच्चे को अपने स्लीपिंग पैटर्न को पैरेंट्स के अकार्डिंग ढालने में वक्त लगता है। इसके लिए मां को ही अपने बच्चे को स्लीप ट्रेनिंग देनी होती है। हालांकि आपको बच्चे को स्लीप ट्रेनिंग देते समय काफी धैर्य का परिचय देने की जरूरत होती है। कई बार मां अपने बच्चे की स्लीप के कारण परेशान होती हैं, क्योंकि इससे उन्हें भी काफी परेशानी होती है। हो सकता है कि बच्चे को स्लीप ट्रेनिंग देते समय आप कुछ गलतियां कर रही हों। तो चलिए जानते हैं उन गलतियों के बारे में, जिसे अक्सर महिलाएं बच्चे को स्लीप ट्रेनिंग देते हुए करती हैं, जबकि वास्तव में उन्हें इससे बचना चाहिए-

भोजन के बाद सुलाना

mistakes to avoid while sleep training baby

चूंकि शुरूआत में बच्चे अपनी दिनचर्या को ढालने की कोशिश कर रहे होते हैं और इसलिए उनके स्लीप रूटीन में कोई बैलेंस नहीं होता। आमतौर पर देखा जाता है कि खाना खाने के तुरंत बाद सो जाते हैं। छोटे शिशुओं को हर दो से तीन घंटे में फीड करने की आवश्यकता होती है। ऐसे में आप इसे स्लीप ट्रिक के रूप में इस्तेमाल ना करें। ऐसा करने से बच्चा हर बार सोने से पहले फीड करना चाहेगा। इससे उनका नार्मल स्लीप साइकल प्रभावित होगा।

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गलत समय पर ट्रेनिंग शुरू करना

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कहते हैं कि हर चीज का एक सही वक्त होता है, फिर भले ही बात आपके बेबी की स्लीप ट्रेनिंग की क्यों ना हो। शिशुओं में 4-6 महीने की उम्र के बीच स्वयं को शांत करने की क्षमता विकसित होती है और इसलिए वह उस दौरान अपनी जरूरत के अनुसार सोते हैं। अगर आप छह महीने से पहले बच्चे की स्लीप ट्रेनिंग शुरू करेंगी तो इससे आपको कोई लाभ नहीं होगा।

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इसलिए उसकी स्लीप ट्रेनिंग उसके छह महीने पूरे हो जाने के बाद ही करें। और चार महीने से पहले बच्चे के संकेतों का पालन करें। इससे अपको उसके सोने के तरीके को समझने में मदद मिलेगी।

स्ट्रॉलर में नैपिंग नहीं 

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आमतौर पर छोटे बच्चों को दिन में सोने की आदत होती है। कई बार बच्चे स्ट्रॉलर में घूमते-घूमते ही सो जाते हैं। यह देखने में भले ही एक सुविधाजनक तरीका लगे, लेकिन वास्तव में आपको इससे बचना चाहिए। दरअसल, ऐसा करने से बच्चे को स्ट्रॉलर पर सोने की आदत पड़ जाती है, जिसके कारण उन्हें रात में बिस्तर पर सोने में कठिनाई हो सकती है।

देर तक सोने देना

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जब बच्चा सो रहा होता है तो अक्सर मां उन्हें देर तक सोने देती हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे अधिक समय तक सोएंगे, तो इससे उनकी नींद पूरी हो जाएगी। लेकिन यह वास्तव में बैकफायर हो सकता है। देर से उठने वाले बच्चों का स्लीप पैटर्न भी बिगड़ जाता है। ऐसे बच्चे फिर देर से सोते हैं और उठते भी देर से ही हैं। 

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