जब भी खाने में स्वाद बढ़ाने की बात आती है, सबसे पहले मसाले ही याद आते हैं, या फिर यूं कहा जाए कि मसालों के बिना तो खाने का स्वाद पूरा ही नहीं हो सकता है। कुछ ऐसे ही मसालों को हमारे किचन तक पहुंचाने वाले मसाला किंग और " महाशियां दी हट्टी" MDH कंपनी के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी आज हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन जब भी मसालों का जिक्र होगा और खाने का स्वाद बढ़ाना होगा उनका नाम हमेशा याद किया जाएगा। धर्मपाल गुलाटी की जमीन से उठकर आसमान की बुलंदियों को छूने तक की कहानी वास्तव में रोचक है। आइए जानें मसालों के किंग के जीवन से जुड़ी कुछ ख़ास बातें। 

कब हुआ जन्म 

महाशय धर्मपाल गुलाटी का जन्म 27 मार्च 1923 में अविभाजित भारत के सियालकोट, पाकिस्तान, के मियानपुरा में हुआ था। इनके पिता का नाम महाशय चुन्नीलाल गुलाटी था और माता का नाम चनन देवी था। उनके पिता की सियालकोट के बाजार में मिर्च मसालों की एक दुकान थी, जिसका नाम महाशियां दी हट्टी था। पूरे सियालकोट में उनकी देगी मिर्च की धूम थी। धर्मपाल गुलाटी की पांच बहनें और दो भाई हैं। 

आरम्भिक जीवन और शिक्षा 

dharam pal gulati

उनका आरंभिक जीवन सामान्य रहा। वर्ष 1933 में, उन्होंने 5 वीं कक्षा की पढाई पूरी करने से पहले स्कूल छोड़ दिया था। कहा जाता है कि धर्मपाल जी का मन पढ़ने में नहीं लगता था और उन्हें पतंगबाजी और कबूतरबाजी का शौक था। इसके अलावा महाशय धर्मपाल को पहलवानी का भी शौक था। 1937 में, उन्होंने अपने पिता की मदद एक छोटा सा व्यवसाय स्थापित किया और इसके बाद साबुन व्यापार और कई व्यापार किये लेकिन किसी भी जगह बहुत ज्यादा सफल नहीं हो सके और अपने पिता के व्यवसाय में ही उनका हाथ बंटाने लगे। 

कब आये भारत 

महाशय धर्मपाल गुलाटी 1947 में देश के बंटवारे के समय भारत की राजधानी दिल्ली आए और अमृतसर में एक शरणार्थी शिविर में रहे।। इनके पिता जी की पाकिस्तान में मसालों की दुकान थी। जिसका नाम महाशियां दी हट्टी था। धर्मपाल गुलाटी ने दिल्ली में आने के बाद करोल बाग में तांगा चलाने का काम किया। फिर बाद में करोल बाग की अजमल खां रोड पर अपनी छोटी सी मसालों की दुकान खोली। 

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चलाते थे तांगा 

धर्मपाल गुलाटी के सामने दिल्ली आकर पैसा कमाना सबसे बड़ी चुनौती थी। जब वो भारत आये तब उनकी जेब में मात्र 1500 रुपये ही बचे थे। पिता से मिले इन 1500 रुपये में से 650 रुपये का धर्मपाल जी ने घोड़ा और तांगा खरीद लिया और रेलवे स्टेशन पर तांगा चलाने लगे। कुछ दिनों बाद उन्होंने तांगा अपने भाई को दे दिया और करोलबाग की अजमल खां रोड पर ही एक छोटा सा खोखा लगाकर मसाले बेचना शुरू कर दिया। 

वैवाहिक जीवन

married life dharampal

देश में चारों तरफ जब आजादी का आंदोलन पूरे उफान पर था। उस दौर में 18 बरस की उम्र में धर्मपाल जी का विवाह लीलावती के साथ हुआ। शादी के बाद नई जिम्मेदारी को धर्मपाल ने बखूबी निभाया और 1992 में महाशय धर्मपाल की पत्नी लीलावती का निधन हो गया। 

करोल बाग में खोला पहला स्टोर

दिल्ली के करोल बाग में धर्मपाल जी ने एक स्टोर खोला। गुलाटी ने 1959 में आधिकारिक तौर पर कंपनी की स्थापना की थी। यह व्यवसाय केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में भी फैल गया। इससे गुलाटी भारतीय मसालों के एक वितरक और निर्यातक बन गए। आज इस महाशियां दी हट्टी की भारत और दुबई में 18 फैक्ट्रियां हैं। 

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यूं बने मसाला किंग

विभाजन के समय धर्मपाल जी का सम्पन्न परिवार सियालकोट से जब भारत आया तो इनके पास कुछ भी नहीं था। किसी तरह दिल्ली पहुंचने के बाद साल 1948 में धर्मपाल ने अपना तांगा ख़रीदा और पर 2 महीने बाद ही तांगा चलाना छोड़ कर करोलबाग की अजमल खां रोड पर एक छोटी सी दुकान बना ली। सियालकोट की एक बड़ी दुकान से उठ कर अब धर्मपाल का पूरा परिवार एक छोटी सी जगह में आ गया था। मेहनती और व्यापार में निपुण धर्मपाल ने अखबारों में विज्ञापन देने शुरु किये और जैसे लोगों को उनके बारे में पता चला धर्मपाल का कारोबार तेजी से फैलने लगा। 60 का दशक आते-आते महाशियां दी हट्टी करोलबाग में मसालों की एक मशहूर दुकान बन चुकी थी।  

खुद ही पीसते थे मसाला 

mdh masale

मसालों की शुद्धता गुलाटी परिवार के मसालों के व्यापार की नींव थी। यही वजह थी कि धर्मपाल ने मसाले खुद ही पीसने का फैसला कर लिया था।  लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था। धर्मपाल जी का ये संघर्ष ही उनकी कामयाबी की वजह बनी। गुलाटी परिवार ने 1959 में दिल्ली के कीर्ति नगर में मसाले तैयार करने की अपनी पहली फैक्ट्री लगाई जिसका आज सालाना करोडों रुपयों का टर्न ओवर है। 

विज्ञापन से हुए मशहूर 

धर्मपाल गुलाटी अपने मसालों के खुद ही ब्रांड अम्बेस्डर थे और विज्ञापन की वजह से ही वो मसालों के बादशाह बनने में कामयाब हो सके। आज भी जब धर्मपाल गुलाटी जी मसालों के विज्ञापन में आते हैं लोग उनके मसालों के स्वाद में खो जाते हैं। 

कमाई का 90 फीसदी करते थे दान

गुलाटी की कंपनी ब्रिटेन, यूरोप, यूएई, कनाडा आदि सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मसालों का निर्यात करती है। 2019 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। एमडीएच मसाला के अनुसार, धर्मपाल गुलाटी अपने वेतन की लगभग 90 प्रतिशत राशि दान करते थे। उनका ये समाज सेवी व्यवहार उन्हें औरों से अलग बनाता है। 

मिला पद्मभूषण सम्मान 

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2019 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। 

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अरबों की है संपत्ति 

धर्मपाल गुलाटी जी का बिजनेस एंपायर अब 2000 करोड़ रुपये का हो चुका है। उनकी कंपनी सालाना अरबों रुपयों का कारोबार करती है। ये अदभुत कामयाबी 60 सालों की कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा है। अरबपति होने के बाद भी महाशय धर्मपाल ईमानदारी, मेहनत और अनुशासन का पाठ कभी भूले नहीं। यही वजह है कि आज उनके मसाले दुनिया के सौ से ज्यादा देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं और इसके लिए उन्होंने देश और विदेश में मसाला फैक्ट्रियों का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया है। 

महंगी कारों के शौक़ीन 

luxurious cars

मसाला किंग धर्मपाल गुलाटी जी महँगी कारों के शौक़ीन थे। उनकी कार कलेक्शन में करोड़ों की कीमत वाली कारण शामिल हैं जिनमें से रोल्स-रॉयस घोस्ट, क्रिसलर 300C लिमोसिन, मर्सिडीज-बेंज एम-क्लास एमएल 500, टोयोटा इनोवा क्रिस्टा, टोयोटा फॉर्च्यूनर, होंडा डब्ल्यूआर-वी आदि कारण शामिल हैं। यहाँ तक कि दुनिया की सबसे महंगी कार भी उनके कार कलेक्शन का हिस्सा है। 

कैसे हुई मृत्यु 

मसाला किंग एमडीएच कंपनी के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी का 98 वर्ष की उम्र में 3 दिसंबर 2020 को ह्रदय गति रुकने की वजह से देहांत हो गया। उन्होंने माता चन्नन देवी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। 98 वर्षीय महाशय धर्मपाल लंबी बीमारी के चलते पिछले कई दिनों से माता चन्नन हॉस्पिटल में भर्ती थे। 

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