हाल ही में हमें नेहा कक्कड़ और काजल अग्रवाल की शादी की फोटो देखने को मिली हैं, जिसमें नए-नए फैशन टिप्स भी थे। साउथ इंडियन एक्ट्रेस काजल भी 30 अक्टूबर को गौतम किचलू के साथ शादी के पवित्र बंधंन में बंध गई हैं, लेकिन उनकी शादी में एक खास बात थी। आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, उन्होंने कश्मीरी रिती-रिवाजों से शादी की थी जिसके बारे में हम सभी जानना चाहते हैं। कश्मीर जितना सुंदर है, उतने ही सुंदर और अलग हैं वहां के रिती-रिवाज। कश्मीरी शादी की रस्में बिल्कुल अलग होती हैं, जिसमें दुल्हन के पहनावे से लेकर, विदाई तक की रस्में शामिल होती हैं। यहां हम आपको बताएंगे कश्मीरी वेडिंग में किस तरह रिवाजों को अपनाया जाता है और दूल्हा-दुल्हन कैसे तैयार होते हैं।

शादी के पहले की रस्में

 जब भी शादी की बात की जाती है, तो उसमें दोनों परिवार पहले सभी रस्मों को अपनाते हैं और उनके अनुसार सारे विधि-विधान से शादी करते हैं। कश्मीरी शादी में शादी के पहले ही 12 तरह की रस्में होती हैं, जिसमें रिश्ता तैय होने से हल्दी तक की रस्में हैं।

कसमद्रई (Kasamdry)

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इस रस्म में दूल्हा-दुल्हन दोनों के परिवार व बुजुर्ग एक मंदिर में मिलते हैं और औपचारिक रूप से रिश्ता तय करते हैं। इसमें केवल फूलों का आदान-प्रदान किया जाता है और सभी उत्सव शुरु करते हैं। कसमद्रई में पारंपरिक कश्मीरी भोजन बनाया जाता है, जिसका नाम वर है और यह एक तरह की स्पेशल चावल की पुडिंग होती है। इतना ही नहीं इसे दूल्हा-दूल्हन की चाची मिलकर बनाती हैं और रिश्तेदारों व पड़ोसियों में बांटती हैं।

गंदुन (Gandun)   

 इस रस्म में पारिवारिक पुजारी कश्मीरी कैलेंडर के अनुसार, एक औपचारिक सगाई समारोह की तारीख तय करता है। यह समारोह एक मूर्ती के सामने होता है, जिसकी सभी पूजा करते हैं। इस रस्म में वर-वधू के बीच उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता है और भव्य उत्सव की तैयारियां होती हैं। वर-वधू अंगूठियों को आदान प्रदान करते हैं और सभी को पारंपरिक भोजन करवाया जाता है।

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लिवुन (Livun)

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पहले कश्मीरी घर मिट्टी के बने होते थे, जिन्हें शादी के समय पर नई मिट्टी का लेप लगाकर, घर को सजाया जाता था। लिवुन रस्म में भी कश्मीरी वर-वधु दोनों के घरों में दोनों ही परिवार जाते हैं और मिलकर साफ-सफाई करते हैं। इसमें विवाहिक महिलाएं भाग लेती हैं और वर-वधु के माता-पिता उन्हें बदले में नकद या उपहार देते हैं।

वुरी (Wuri)

 लिवुन के दिन ही परिवार का रसोइया मिट्टी के ईंट का चूल्हा तैयार करता है, जिसमें समारोह का सारा खाना तैयार किया जाता है। परंपरिक रूप से कश्मीरी पंडितों के घर मांस खाना मना है, इसलिए शाकाहारी व्यंजन ही बनाए जाते हैं। हालांकि कभी-कभी होटल में भी पारंपरिक खाने की व्यवस्था की जाती है।

वानवुन 

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इस रस्म में वर-वधु दोनों के घर में संगीत समारोह होता है, जिसमें लोक गीत गाए जाते हैं। पड़ोसी और रिश्तेदार सभी इस रस्म में हिस्सा लेते हैं और नाच-गाना करते हैं। शाम के समय में टुंबक की ध्वनि सभी को सुनाई जाती है। टुंबक एक संगीत यंत्र को कहा जाता है। शाम के समय मेहमानों को गुलाबी चाय पिलाई जाती है, जिसे सरासर चाय कहा जाता है।

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क्रूल खारुन (Krool Kharun) 

 इस रस्म में वर-वधु दोनों के मुख्य द्वारों को पारंपरिक रंगों से सजाया जाता है। यह रस्म वर-वधु की बुआ ही निभाती हैं। परिवार के सदस्य संगीत और नृत्य में भाग लेते हैं और एक पारंपरिक लंच या डिनर परोसा जाता है। क्रूल खारुन की शाम में वधु के घर उसे स्नान कराया जाता है और बड़ी चाची दुल्हन के साधन (मेहंदी) लगाती है। इसके बाद सभी महिलाएं भी उसी मेहंदी को लगाती हैं। कई परिवारों में संगीत के लिए बाहर से मेहंदी प्रोफेशनल बुलाए जाते हैं।

याग्नेओपावित (Yagneopavit)

अगर दूल्हे को जनेऊ धारण नहीं करवाया गया है, तो यह शादी के पहले करवाया जाता है। अगर दूल्हे का अपनी किशोरावस्था के बाद जनेऊ किया है, तो उसे अपनी शादी से पहले 6-तार वाला धागा पहनना होगा। यदि जनेऊ धारण करने का समारोह दूल्हे के बचपन में किया गया था, तो वे 3 तार वाला धागा पहन सकते हैं।

दिवागोन (Divagon)

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दूल्हा और दुल्हन अपने-अपने घरों में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करते हैं, क्योंकि यह समारोह अलग-अलग ही मनाया जाता है। इस समारोह में भाग लेने वाले वर-वधू के परिजन और रिश्तेदार एक दिन पहले व्रत रखते हैं। यह समारोह परिवार के पुजारी द्वारा पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर पूरा किया जाता है। दुल्हन को तोहफे में ज्वेलरी दी जाती है और उसे सजाया जाता है। आखिर में वर-वधू को चावल, दही, दूध और पानी से स्नान कराया जाता है।

खीर टाबे (Khir Tabche)

टाबे (Tabche) एक पारंपरिक बर्तन है, जिसे हाथ से बनाया जाता है और इसमें खाने के बाद खीर परोसी जाती है। सभी महिलाओं को रात के खाने के लिए आमंत्रित किया जाता है और कश्मीरी भोजन कराया जाता है। खाने के बाद, टाबे में खीर परोसी जाती है।

दुरीबत (Duribat)

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दूल्हा और दुल्हन के लिए एक ही दिन दुरीबत समारोह होता है। दोनों के रिश्तेदारों को पारंपरिक दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। भोजन के लिए पारंपरिक काहवा भी शामिल होता है। इस समारोह में भी उपहारों का आदान-प्रदान होता है, जहां दादा-दादी या रिश्तेदारों द्वारा दिए गए कपड़ों के साथ दूल्हे या दुल्हन स्नान करते हैं। 

दू्ल्हे का पहनावा

कश्मीरी दूल्हे द्वारा पहनी जाने वाली पारंपरिक पोशाक को फेरन के रूप में जाना जाता है। जो लंबी आस्तीन वाले कुर्ते जैसी पोशाक होती हैं। Pheran को कमर से कमरबंद के साथ बांधा जाता है, जिसे लूइंग कहा जाता है। इसे पश्मीना से बनाया जाता है, जिसपर ज़ारबफ नामक सुनहरे धागे के साथ कढ़ाई की जाती है। गॉर्डस्टार नामक एक पगड़ी को दूल्हे के रिश्तेदारों में से कोई एक दूल्हे के सिर पर बांधता है। इसके अलावा दूल्हे को जरी और हैवी नग वाले हार भी पहनाए जाते हैं, जो दिखने में अच्छे लगते हैं।

दुल्हन का पहनावा

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दुल्हन द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक सिरगेट को तारंगा कहा जाता है। कलफश एक लंबा और सफेद कपड़ा होता है, यह तारंगा के नीचे पहना जाता है।  कलफश को परतों में माथे पर लपेटा जाता है और इससे से सिर को आधा ढ़का जाता है। जूह दोनों तरफ से महीन रेशम और कपास से बना होता है, इसे सिर के ऊपर बीच में रखा जा सकता है। कश्मीरी ब्राइडल आउटफिट्स कलरफुल और ग्लैमरस होते हैं। परंपरागत रूप से, दुल्हन फेरन का एक ग्लैमरस रूप पहनती है, जो सलवार कमीज जैसा दिखता है। दुल्हन के कपड़ों के रंगों में लाल, मैरून और नारंगी रंग शामिल होते हैं। कश्मीरी दुल्हन एक देझारो भी पहनती है, जो रस्म का हिस्सा होता है। इसके अलावा, दुल्हन हैवी नेकपीस, चूड़ियां और पायल भी पहनती है। 

दूल्हे की घुड़चढ़ी

जैसे ही दूल्हा तैयार हो जाता है, परिवार की एक महिला चावल वाली थाली और कुछ पैसों से दूल्हे के बाएं कंधे को छूती है। दूल्हा घोड़ी पर चढ़ता है, तलवार चलाता है और परिवार के कुछ पुरुष सदस्यों के साथ दुल्हन के घर की ओर जाता है।  

लगन

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कश्मीरी पंडित शादियों में भी सात फेरे होते हैं, जो पवित्र बंधंन के प्रतीक हैं। इस समारोह को लगन के रूप में जाना जाता है, जिसे वर-वधू पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाकर पूरा करते हैं। इस समारोह के अंत में, दूल्हा और दुल्हन दोनों एक दूसरे को चावल खिलाते हैं। इसके बाद, दूल्हा और दुल्हन को बैठाया जाता है और उनके सिर के ऊपर एक लाल कपड़ा रखा जाता है। आस-पास के मेहमान फूलों की बौछार करते हैं और साथ-साथ मंत्रों का वेदों से जाप किया जाता है। यह शिव और पार्वती के रूप में फूल से पूजा करने का एक तरीका भी माना जाता है। सभी रस्मों के बाद रिश्तेदार और वर-वधू को पारंपरिक भोजन कराया जाता है।

विदाई

विदाई का समय होता है, जब दुल्हन अपने परिवार से विदा लेती है। इस रस्म के अंत में वर-वधू को एक लकड़ी के व्यूग पर खड़ा किया जाता है। इसके बाद परिवार की सभी महिलाएं दोनों के माथे को चूमती हैं और आशीर्वाद देती हैं, इसे कश्मीरी शादी में नाबद के रूप में जाना जाता है। 

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