हिंदू धर्म में सभी व्रत और त्योहारों का अपना अलग महत्व है। सभी व्रतों का फल अलग होता है और मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु भक्त जन व्रत पूरी श्रद्धा पूर्वक करते हैं। इन्हीं व्रतों में से एक होता है प्रदोष का व्रत। यह व्रत भगवान् शिव को समर्पित होता है और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष रूप से फलदायी होता है। ऐसा माना जाता है कि वरदोष व्रत में श्रद्धा पूर्वक व्रत रखने और शिव पार्वती का पूजन करने से भक्तों को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। 

प्रत्येक महीने में दो प्रदोष व्रत रखे जाते हैं। पहला कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को और दूसरा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को। इस प्रकार पूरे साल में 24 प्रदोष व्रत होते हैं। प्रत्येक महीने के प्रदोष व्रतों का हिंदू धर्म में अलग महत्व बताया गया है। इसी प्रकार हिंदू धर्म में कार्तिक के महीने में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का भी अलग ही महत्व है क्योंकि यह महीना हिंदू पांचांग के सर्वोत्तम महीनों में से एक माना जाता है। आइए अयोध्या के जाने माने पंडित राधे शरण शास्त्री जी से जानें कि कार्तिक मास का दूसरा यानी शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला प्रदोष व्रत कब है और इसका क्या महत्व है। 

कार्तिक मास प्रदोष व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त 

pradosh vrat kartik month significance.

  • इस साल कार्तिक मास (कार्तिक मास में तुलसी पूजन का महत्व) शुक्ल पक्ष में प्रदोष व्रत16 नवंबर, मंगलवार को पड़ेगा। मंगलवार को पड़ने की वजह से इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। 
  • कार्तिक मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि आरंभ- 16 नवंबर 2021 प्रातः 10 बजकर 31 मिनट से 
  • कार्तिक मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि समाप्त- 17 नवंबर 2021 दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर 
  • चूंकि प्रदोष काल 16 नवंबर को ही प्राप्त हो रहा है इसलिए इसी काल में व्रत रखना फलदायी माना जाएगा। 
  • पूजन का शुभ मुहूर्त- शाम 6 बजकर 55 मिनट से लेकर 8 बजकर 57 मिनट तक होगा। 
  • प्रदोष व्रत का पूजन सदैव प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय ही करना चाहिए। इससे भक्तों को लाभ प्राप्त होता है। 

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प्रदोष व्रत का महत्व 

हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती के लिए रखे जाने वाले प्रदोष व्रत का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। मुख्य रूप से जब यह व्रत कार्तिक के महीने में पड़ता है तब इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि कार्तिक का महीना पूजा पाठ के लिए भी बहुत महत्व रखता है। प्रदोष काल सूर्यास्त और रात्रि के समय के बीच की अवधि होती है और प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहले आरंभ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट तक रहता है। प्रत्येक मास के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन रखे जाने वाले इस व्रत से सुख-संपत्ति और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। इस व्रत को करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और संतान का स्वास्थ्य बना रहता है। इस दिन शुभ मुहूर्त में पूरे विधि विधान के साथ व्रत और शिव जी का माता पार्वती समेत पूजन करना चाहिए। 

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प्रदोष व्रत पूजा की विधि 

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  • प्रदोष व्रत के दिन प्रातः जल्दी उठाकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। 
  • शर के मंदिर की सफाई करें और सभी देवताओं को स्नान कराएं और स्वच्छ वस्त्र पहनाएं। 
  • शिवलिंग को स्नान कराएं और घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • यदि आप व्रत रख रही हैं तो व्रत का संकल्प लें और पूरे दिन फलाहार ग्रहण करें। 
  • प्रदोष काल में शिव जी का श्रद्धा पूर्वक माता पार्वती समेत पूजन करें, प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें और शिव चालीसा का पाठ करें। 
  • भगवान शिव को पुष्प, धूप, दीप नैवेद्य आदि अर्पित करें और मंगल की कामना करें। 
  • भगवान शिव को जो नैवेद्य अर्पित करें वो सभी को वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें। 

इस प्रकार प्रदोष के व्रत का पालन और शिव पूजन करना विशेष रूप से फलदायी होता है और इस व्रत को करने वाले मनुष्यों को शुभ फलों की प्राप्ति होती है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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