हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है और इस दिन मुख्य रूप से शिव जी का माता पार्वती समेत पूजन किया जाता है। मान्यता है कि जो प्रदोष में पूरे भक्ति भाव से पूजन और व्रत करता है उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलने के साथ मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हर महीने  की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है और यह व्रत महीने में दो बार होता है। पहला प्रदोष व्रत शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष में पड़ता। इस प्रकार पूरे साल में 24 त्रयोदशी तिथियां होती हैं जिनमें प्रदोष का व्रत रखा जाता है।

वैसे तो सभी प्रदोष व्रतों का अपना अलग महत्व है लेकिन कार्तिक महीने में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का विशेष फल प्राप्त होता है क्योंकि ये महीना हिन्दुओं के सबसे पवित्र महीनों से से एक है। आइए अयोध्या के जानें माने पंडित श्री राधे धारण शास्त्री जी से जानें इस साल कार्तिक में कब होगा प्रदोष का व्रत, पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्त्व। 

कार्तिक मास प्रदोष व्रत तिथि 

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  • इस साल यानी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 2 नंवबर, मगंलवार को पड़ेगी और इसी दिन प्रदोष का व्रत रखा जाएगा। इस साल यह व्रत मंगलवार के दिन पड़ेगा इसलिए इसे भौम प्रदोष कहा जाएगा।  
  • भौम प्रदोष व्रत तिथि प्रारम्भ -2 नवंबर, दोपहर 02:01 से लेकर
  • भौम प्रदोष व्रत तिथि समाप्त - 3 नवंबर, दोपहर 1:32 तक 
  • चूंकि प्रदोष काल 2 नवंबर को प्राप्त हो रहा है इसलिए इस दिन प्रदोष का व्रत रखना फलदायी होगा। 
  • भौम प्रदोष की पूजा आप सायं 06:42 से लेकर रात्रि 08:49 तक कर सकते हैं। 

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भौम प्रदोष का महत्व 

जब प्रदोष व्रत मंगलवार के दिन पड़ता है तब इस भौम प्रदोष कहा जाता है और इसका महत्त्व और ज्यादा बढ़ जाता है। इस दिन भगवान् शिव की माता पारवती समेत पूजन करने से संतान सुख में वृद्धि होती है और संतान के स्वास्थ्य के साथ घर के समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। प्रदोष व्रत की पूजा सदैव प्रदोष काल में करना ही उत्तम होता है। प्रदोष काल रात होने से पहले और सूर्योदय के बाद का समय होता है जिसमें पूजन मुख्य रूप से फलदायी होता है। भौम प्रदोष में शिव और पार्वती समेत हनुमान जी की पूजा करनी भी शुभ मानी जाती है।

कैसे करें प्रदोष काल में शिव पूजन 

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  • इस दिन प्रातः जल्दी उठाकर स्नान आदि से मुक्त होकर साफ़ वस्त्र धारण करें। 
  • प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का माता पार्वती के साथ पूजन करने का विधान है। 
  • पूजन के लिए  एक साफ़ चौकी पर साफ़ वस्त्र बिछाएं और शिव परिवार की मूर्ति या तस्वीर रखें। 
  • भगवान शिव और माता पार्वती को जलाभिषेक कराएं या शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। 
  • शिव जी पर चंदन से तिलक लगाएं और माता पार्वती को सिन्दूर चढ़ाएं।   
  • शिव जी को धूप, दीप तथा सफ़ेद फूल अर्पित करें साथ ही, बेलपत्र, भांग और धतूरा भी अर्पित करें। 
  • प्रदोष काल में पुनः शिव पूजन करें और प्रदोष व्रत की कथा सुनें। 
  • शिव जी की आरती करें और उन्हें भोग अर्पित करें। 
  • इस भोग को सभी में वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें। 

इस प्रकार प्रदोष काल में शिव पूजन करना मुख्य रूप से फलदायी माना जाता है और इससे व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाओं को पूर्ति होती है। 

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