हिंदू धर्म में प्रत्येक त्योहार का अलग महत्व है और हर एक त्योहार में विशेष रूप से पूजा पाठ और व्रत उपवास करने का विधान है। ऐसे ही व्रत और उपवास में से एक है प्रदोष का व्रत। इस व्रत को हिंदुओं में विशेष फलदायी माना जाता है और इसमें भगवान शिव का पूजन करने का विधान है। महीने में प्रदोष व्रत दो बार आता है एक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि में और एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में। इस दिन को विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

इस साल के पहले महीने जनवरी में पहला प्रदोष व्रत 15 जनवरी 2022 को पड़ेगा। यदि प्रदोष व्रत सोमवार के दिन होता है तो इसे सोम प्रदोष कहा जाता है, यदि बुधवार के दिन होता है तो भौम प्रदोष और गुरूवार और शनिवार के दिन होने वाले प्रदोष व्रत को क्रमशः गुरु और शनि प्रदोष कहा जाता है। इस बार का प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ेगा। शनिवार के दिन पड़ने की वजह से इस व्रत को शनि प्रदोष व्रत कहा जाएगा जिसका सनातन धर्म में अलग महत्व है। आइए प्रख्यात ज्योतिर्विद पं रमेश भोजराज द्विवेदी जी से जानें इस साल के पहले प्रदोष व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व के बारे में। 

जनवरी के पहले प्रदोष व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त 

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  • इस साल का पहला प्रदोष व्रत 15 जनवरी 2022, शनिवार को पड़ेगा। 
  • पौष शुक्ल त्रयोदशी तिथि आरंभ : 14 जनवरी, शुक्रवार, रात्रि 10:19 बजे
  • पौष शुक्ल त्रयोदशी समाप्त: 16 जनवरी प्रातः 12:57 बजे
  • प्रदोष काल आरंभ 15 जनवरी,  शाम 05:46 से रात 08:28 बजे तक
  • चूंकि उदया तिथि और प्रदोष काल दोनों ही 15 जनवरी को मिल रहे हैं इसलिए इसी दिन शनि प्रदोष व्रत रखा जाएगा। 

प्रदोष व्रत पूजन विधि

  • पुराणों के अनुसार प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का माता पार्वती के साथ पूजन करने का विधान है। 
  • यदि आप प्रदोष व्रत करते हैं तो इस दिन प्रातः जल्दी उठाकर स्नान ध्यान से मुक्त होकर सभी भगवानों को स्नान कराएं। 
  • नए वस्त्रों से सुसज्जित करके भगवान शिव का पूजन माता पार्वती समेत करें। 
  • पूरे दिन फलाहार का पालन करते हुए व्रत करें और प्रदोष काल में फिर से शिव पूजन करें। 
  • पूजन के लिए  एक चौकी पर साफ़ वस्त्र बिछाएं और शिव परिवार की मूर्ति या शिवलिंग रखें। 
  • भगवान शिव और माता पार्वती को जलाभिषेक कराएं या शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। 
  • शिव लिंग पर चंदन से तिलक लगाएं और माता पार्वती को सिंदूर अर्पित करें।  
  • प्रदोष काल में पूजन के दौरान प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें। शिव जी की आरती करें और भोग अर्पित करें।
  • भोग में मुख्य रूप से खीर अर्पित करना भगवान शिव को प्रसन्न करना है।  

शनि प्रदोष व्रत कथा 

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पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में एक नगर में एक सेठ रहते थे। उनके घर में सभी सुख सुविधाएं थीं लेकिन कोई संतान नहीं थी। जिसकी वजह से सेठ और उनकी पत्नी हमेशा दुखी रहते थे। बहुत सोचने विचारने के बाद सेठ जी ने अपना सारा कारोबार अपने सेवकों को सौंपा और पत्नी समेत तीर्थ यात्रा पर निकल गए। नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए और जब साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने द्प्नों को आशीर्वाद देते हुए शनि प्रदोष व्रत की सलाह दी जिससे उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हो सके। दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े और तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। तभी से शनि प्रदोष का व्रत अत्यंत फलदायी माना जाने लगा। 

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शनि प्रदोष व्रत का महत्व 

शास्त्रों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि शनि त्रयोदशी शनि देव की जन्म तिथि है। इसलिए इस दिन शनि प्रदोष व्रत रखना और ज्यादा फलदायी हो जाता है। पुराणों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत करने से संतान सुख प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है। इस दिन शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनि के कुछ उपाय भी किये जाते हैं। जैसे शनि मंदिर में तेल चढ़ानेऔर दीपक जलाने से भक्तों की कई मनोकामनाओं को पूर्ति होती है।  

इस प्रकार प्रदोष काल में शिव पूजन करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलने के साथ सभी मनोकामनाओं की पूर्ति भी होती है। इसलिए इस व्रत को पूरे श्रद्धा  भाव से करना चाहिए। 

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