आज का जमाना कम्पीटिशन का है। बचपन में घर में भाई-बहनों से लेकर स्कूल के साथियों यहां तक कि बड़े होने के बाद ऑफिस में कलीग्स के साथ काम करते हुए हमें कई बार कम्पीटिशन मिलते हैं। दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए कि प्रतिस्पर्धा हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक हिस्सा है और इसलिए इसे गलत नहीं समझना चाहिए। अगर प्रतिस्पर्धा को एक सकारात्मक रूप में लिया जाए तो यह व्यक्ति में कई गुणों का संचार करती है और हर एक प्रतिस्पर्धा उसे पहले से भी बेहतर इंसान बनाती है।

वहीं अगर कम्पीटिशन को नकारात्मक रूप में लिया जाए तो यह जलन, तनाव व नकारात्मकता का कारण बन सकती है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि बच्चों को बचपन से हेल्दी कम्पीटिशन के बारे में बताया और सिखाया जाए। यह जिम्मेदारी पैरेंट्स की है। अब सवाल यह उठता है कि प्रतिस्पर्धा के प्रति बच्चां के मन में सकारात्मक दृष्टिकोण किस तरह विकसित किया जाए और उन्हें हेल्दी कम्पीटिशन करना किस तरह सिखाया जाए। तो चलिए आज इस लेख में हम आपको ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब दे रहे हैं-

सिखाएं क्या है कम्पीटिशन

right competition in kids

कम्पीटिशन को सकारात्मक रूप देने से पहले यह जरूरी है कि आप पहले बच्चे को सिखाएं कि वास्तव में प्रतिस्पर्धा क्या है। आमतौर पर बच्चे दूसरे बच्चों या फिर बाहरी दुनिया से कम्पीटिशन करते हैं और जब वह फेल होते हैं तो इससे उनके मन में नकारात्मकता या जलन की भावना (जलन की भावना को ऐसे करें हैंडल) पैदा होती है। इसलिए पहले उन्हें समझाएं कि प्रतिस्पर्धा स्वयं के लिए लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करने के बारे में है।

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मसलन, अगर स्कूल में कविता कम्पीटिशन में अगर वह Fumble कर रहा था या फिर घबराहट के कारण वह सही तरह से कविता नहीं बोल पाया और दूसरा बच्चा फर्स्ट आया तो बच्चे को उससे जलन की भावना नहीं रखनी है। बल्कि वास्तव में कम्पीटिशन तो यह है कि वह खुद के लिए ही गोल सेट करे और लगातार अभ्यास से वह कविता पाठन अच्छी तरह करना सीख जाए। इससे जब वह खुद के लिए तय किए गए गोल्स पूरे करता है तो इससे उसे फर्क नहीं पड़ता कि उसे बाहरी दुनिया में कौन सा स्थान प्राप्त हुआ है।

जीत या हार के मायने

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आमतौर पर बच्चे समझते हैं कि अगर वह किसी कम्पीटिशन में हिस्सा लेते हैं तो उनके लिए जीतना बेहद महत्वपूर्ण है और अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो उनके मन में नकारात्मकता बढ़ती है। इसलिए बतौर पैरेंट्स, आपको बच्चे को जीत व हार के मायने सिखाना बेहद जरूरी है।

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उन्हें समझाएं कि अगर उन्होंने किसी कम्पीटिशन में हिस्सा लिया है और वह प्रथम नहीं आए तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उनमें कौशल नहीं है। कम्पीटिशन तो उनके प्रयासों से निर्धारित होता है, रिजल्ट से नहीं। अगर वह सच्चे दिल से मेहनत करते हैं और अपनी उम्मीद के अनुसार परफार्म कर पाते हैं तो यही उनकी सच्ची जीत है। दूसरों से तुलना मन में नकारात्मकता बढ़ाती है।

करें सेलिब्रेट

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अक्सर ऐसा होता है कि जब बच्चा जीतता है तो उसे बड़े स्तर पर सेलिब्रेट किया जाता है, जबकि बच्चे के हारने पर माता-पिता उदास हो जाते हैं। जिसके कारण बच्चे के मन में यह बात बैठ जाती है कि प्रतिस्पर्धी युग में जीतना बेहद जरूरी है, भले ही उसके लिए कुछ भी करना पड़े। इस तरह बच्चे अनहेल्दी कम्पीटिशन की तरफ बढ़ते हैं। इसके बजाय आप बच्चे के प्रयासों की सराहना करना और उसे सेलिब्रेट करने की आदत डालें।

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मसलन, अगर आपने बच्चे के लिए एग्जाम में 70 प्रतिशत अंक लाने का गोल सेट किया था और वह 75 प्रतिशत अंक लेकर आया, लेकिन क्लॉस में पोजिशन होल्ड नहीं कर पाया तो उदास होने के स्थान पर आप उसके प्रयासों और गोल्स को पूरा करने का सेलिब्रेशन करें। इससे बच्चे को यह अहसास होगा कि फर्स्ट आना ही सबकुछ नहीं है, बल्कि सच्चे दिल से किया गया प्रयास कम्पीटिशन को हेल्दी बनाता है।

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