मां बनना एक महिला के लिए बहुत ही अनोखा अनुभव होता है और वो अपने बच्चे के साथ एक जुड़ाव महसूस करने लगती है, लेकिन अगर किसी वजह से उसके बच्चे को कुछ हो जाए तो उसे स्ट्रेस भी काफी हो जाता है। ऐसे में अगर महिला को अबॉर्शन करवाना पड़े तो शायद ये उसके लिए काफी बड़ा फैसला साबित हो सकता है और निजी भी। जहां तक गर्भवती महिला के अबॉर्शन की बात है तो भारत में ये लीगल तो है, लेकिन सिर्फ 20 हफ्तों तक और अगर दो मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह ली जाए तो ये 24 हफ्तों तक ही लीगल माना जाता है। पर दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला लिया है जो इस 24 हफ्तों की लिमिट को क्रॉस करता है।

एक निजी मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने 28 हफ्तों की प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करने की अनुमति दे दी है। इस मामले को लेकर लोगों की राय भी अलग है, अगर एक्सपर्ट्स से पूछा जाए तो उनका क्या कहना होगा?

चलिए इस बारे में पूरी जानकारी लेते हैं और लीगल एक्सपर्ट और गायनेकोलॉजिस्ट से जानते हैं कि आखिर 28 हफ्तों में प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करना क्यों मना किया जाता है और इसके परिणाम क्या होते हैं।

pregnancy termination at th week

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आखिर किस मामले में दी गई प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने की अनुमति-

इस मामले में 33 साल की एक महिला अपने रेगुलर चेकअप के लिए गई थी और 24 हफ्तों को पूरा करने के बाद ही उसे पता चला कि बच्चे में एक रेयर हार्ट कंडीशन है।

अलग-अलग एक्सपर्ट्स से बात करने के बाद उसे पता चला कि बच्चे को जो मेडिकल कंडीशन है उसके बाद उसके पास सिर्फ 50% गुंजाइश है कि वो अपने जन्म के 1 साल बाद भी जी पाएगा और उसे आगे जिंदा रहने के लिए भी काफी सारी सर्जरी की जरूरत होगी।

जब तक महिला को इस बारे में पता चला काफी देर हो चुकी थी और इसलिए उसे अपनी प्रेग्नेंसी को अबॉर्ट करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का कहना था कि क्योंकि महिला के बच्चे को इसमें परेशानी होती और महिला के लिए ये मानसिक तनाव पैदा करता इसलिए ये जरूरी था।

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लीगल एक्सपर्ट की क्या है राय? 

हमने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की एडवोकेट इश्मीत कौर तलूजा से बात की और उनसे ये जानने की कोशिश की कि आखिर इस फैसले में उनकी क्या राय है, उनका कहना है, 'कोर्ट ने सही फैसला लिया है क्योंकि ये फैसला अपीलकर्ता की निजी स्थिति को देखते हुए लिया गया है। पेट में पल रहा बच्चा गंभीर रूप से बीमार था और इस मामले में संविधान के आर्टिकल 21 के हिसाब से फैसला लिया गया है जिसमें जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है।' 

'कोर्ट ने ये फैसला बहुत सोच समझ कर लिया है क्योंकि इस मामले में महिला की मानसिक स्थिति पर भी असर पड़ रहा था और जिस माहौल में महिला बच्चे को जन्म देती वो बच्चे के लिए भी सुविधाजनक नहीं था। बच्चे को जरूरत से ज्यादा केयर लगती और इस मामले में मां पर आर्थिक, मानसिक और शारीरिक तनाव ज्यादा बढ़ जाता।' 

इस मामले में क्या है गायनेकोलॉजिस्ट की राय? 

हमने इस मामले में IVF एक्सपर्ट और गायनेकोलॉजिस्ट अर्चना धवन बजाज से बात की और ये जानने की कोशिश की कि आखिर 28वें हफ्ते में प्रेग्नेंसी को खत्म करना इतना बड़ा फैसला क्यों है और इसे कितना सुरक्षित माना जाता है? 

pregnancy and gynecologist row

उनका कहना था, '20 हफ्ते के बाद इसलिए प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन को मना किया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि बच्चे का विकास और जरूरी अंग पूरी तरह से बन गए हैं और ऐसे में बच्चे की जान आप खतरे में नहीं डाल सकते। 24 हफ्तों में भी प्रेग्नेंसी सिर्फ उसी केस में टर्मिनेट की जाती है जहां दो मेडिकल प्रोफेशनल की राय एक जैसी हो। 28वें हफ्ते में बच्चे के सभी जरूरी अंग बन गए होते हैं और इस दौरान बच्चे का वजन लगभग 1 किलो का हो जाता है। इस दौरान प्रेग्नेंसी का टर्मिनेशन डिलीवरी की तरह ही होता है।' 

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'क्योंकि ये डिलीवरी की तरह ही होता है इसलिए मां को वही सब झेलना पड़ता है जो प्री-टर्म डिलीवरी के दौरान होता है। वेजाइनल समस्याओं के लेकर प्रेग्नेंसी के दर्द, बच्चे को पैदा करने का कष्ट और सारी समस्याएं बिल्कुल वैसी ही होती हैं। यहां तक कि बच्चे के जन्म के बाद पोस्ट पार्टम समस्याएं और डिप्रेशन भी। यही कारण है कि इस समय बच्चे का अबॉर्शन मना किया जाता है, लेकिन इस रेयर मामले में बच्चे में कई कमियां पाई गई थीं जो आगे चलकर मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकती थीं।' 

इस मामले में मां के जीवन के अधिकार पर भी ध्यान दिया गया। मां पूरी जिंदगी इस तरह की मानसिक प्रताड़ना से पीड़ित ना रहे इसलिए ऐसा फैसला दिया गया है। आपकी इस बारे में क्या राय है ये हमें हरजिंदगी के फेसबुक पेज पर जरूर बताएं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।