मां बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे बड़ा सपना होता है। जब एक महिला प्रेग्नेंट होती है तो उसकी मानसिक और शारीरिक सभी तरह की गतिविधियों का प्रभाव होने वाले बच्चे पर पड़ता है। इसीलिए एक प्रेग्नेंट महिला को हमेशा मन में अच्छे विचार लाने की सलाह दी जाती है। लेकिन जब एक ऐसी गर्भवती महिला अपने घर में ही हिंसा की शिकार हो तो आप क्या कहेंगे। 

जी हां, आज भी हमारे देश की न जाने कितनी महिलाएं घरेलू हिंसा, बलात्कार या फिर अविवाहित ही प्रेग्नेंट हो जाती हैं और पूरे समय उदास वातावरण से गुजरते हुए बच्चे को जन्म देती हैं। इसका पूरा असर बच्चे के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे HC ने एक महिला के स्वस्थ 23-सप्ताह के भ्रूण को गर्भपात करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है, जिसमें कहा गया है कि घरेलू हिंसा की शिकार महिला ऐसा कदम उठा सकती है जिससे उसका असर बच्चे पर न पड़े। आइए जानें क्या है पूरी खबर -

घरेलू हिंसा की शिकार महिला करा सकती है गर्भपात 

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महिला के स्वस्थ 23-सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है, जिसमें कहा गया है कि घरेलू दुर्व्यवहार का एक महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है और यह चिकित्सकीय रूप से उसकी गर्भावस्था को समाप्त करने का एक वैध कारण हो सकता है। 3 अगस्त को जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस माधव जामदार की बेंच ने अपना फैसला सुनाया, जिसे 17 अगस्त मंगलवार को सार्वजनिक किया गया है ।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गर्भावस्था समाप्ति की अनुमति दी

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों का भी उल्लेख किया, जैसा कि डब्ल्यूएचओ द्वारा परिभाषित किया गया है। मुंबई के सरकारी जे जे अस्पताल के विशेषज्ञों के एक पैनल ने घरेलू हिंसा की शिकार 22 वर्षीय महिला की जांच की। जबकि उसका अजन्मा बच्चा स्वस्थ था और उसमें कोई असामान्यता नहीं थी, पैनल ने निर्धारित किया कि महिला ने महत्वपूर्ण मानसिक तनाव का अनुभव किया था और गर्भावस्था को जारी रखने से वह आघात बढ़ जाएगा।

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महिला ने की थी याचिका दायर 

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एक रिपोर्ट के अनुसार  महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले की निवासी 23 वर्षीय महिला, 20 सप्ताह के भीतर गर्भपात करवाने के लिए लॉकडाउन के कारण अपील नहीं कर पायी थी। 29 मई को, महिला की याचिका के बाद, उच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ ने रत्नागिरी के सिविल अस्पताल में एक मेडिकल बोर्ड को निर्देश दिया कि वह किसी भी संभावित स्वास्थ्य जोखिम के लिए उसका आकलन करे।  अपनी याचिका में, महिला ने कहा था कि गर्भावस्था एक अवैध संबंध का परिणाम है, वह इसे अविवाहित होने के कारण आगे नहीं ले जा सकती है। वह मानसिक रूप से मां बनने के लिए तैयार नहीं थी। 

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क्या है मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम के तहत एक डॉक्टर से परामर्श के बाद, गर्भावस्था के 12 सप्ताह तक ही गर्भपात की अनुमति दी जाती है।  12 से 20 सप्ताह के बीच गर्भावस्था की समाप्ति के लिए, दो डॉक्टरों की चिकित्सा राय की आवश्यकता होती है। वहीं 20 सप्ताह से ऊपर के समय में अभी तक गर्भपात करने की अनुमति नहीं थी। उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस बात का उल्लेख किया है कि गर्भावस्था ने याचिकाकर्ता के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए कोई जोखिम नहीं है, लेकिन इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है। इस बात को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने किसी भी पीड़ित महिला को गर्भपात की अनुमति दी है। 

मुंबई है हाई कोर्ट की टिप्पणी

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मुंबई हाई कोर्ट ने एचसी ने टिप्पणी की,है कि  "बलात्कार एक महिला पर अत्यधिक हिंसा समिति का एक उदाहरण है। घरेलू हिंसा भी एक महिला पर हिंसा समिति है, हालांकि इसकी डिग्री कम हो सकती है।" यह देखा गया कि अपनी याचिका में, याचिकाकर्ता ने कहा कि यदि बच्चा पैदा होता है, तो उसे अपने पति से आवश्यक वित्तीय और भावनात्मक समर्थन नहीं मिलेगा। उच्च न्यायालय ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में, हमारा विचार है कि याचिकाकर्ता को अनुमति देने से इनकार करना उसे अपनी गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करने के समान है, जो ऐसी परिस्थितियों में न केवल उसके लिए बोझिल और दमनकारी हो जाएगा बल्कि संभावित है उसके मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट पहुंचेगी।" अदालत ने याचिकाकर्ता महिला को मुंबई के कूपर अस्पताल में गर्भपात कराने की अनुमति दी है।

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