क्या आप रोजाना पहाड़ी क्षेत्रों में 8 घंटे तक ट्रैक कर काम कर सकती हैं। वह भी सिर्फ लगभग 2 हजार रुपये महीने के लिए, लेकिन आशा वर्कर्स यह काम पिछले 9 सालों से कर रही हैं। बता दें कि अपनी बुनयादी सुविधाएं और वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर महाराष्ट्र की आशा वर्कर्स अनिश्चित समय के लिए हड़ताल पर हैं। अपनी जिंदगी को जोखिम पर डालकर राज्य की 70 हजार आशा वर्कर महामारी के शुरुआत के बाद से ही लगातार काम कर रही हैं।

आशा वर्कर्स पिछले कुछ समय से लगातार अपनी पगार बढ़ाने की मांग कर रही हैं। बता दें कि इन आशा कार्यकर्ताओं का 4,000 रुपये प्रतिमाह वेतन होने के बावजूद भी इन्हें मात्र 1,650 रुपये प्रतिमाह ही मिल रहे हैं। सैलरी के नाम पर मिलने वाली यह छोटी सी रकम भी उन्हें समय पर नहीं मिलती। वहीं आशा वर्कर्स के हड़ताल पर जाने से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।

आशा वर्कर्स का काम

asha workers work

देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर  हेल्थ सेवाओं से जुड़े काम आशा वर्कर्स ही करती आ रही हैं। महिलाओं की डिलीवरी, सर्वे में भाग लेना, टीकाकरण, और स्वास्थ्य जागरूकता कैंपेन इत्यादी काम आशा वर्कर्स ही करती हैं। हालांकि जितना वह काम करती हैं उसके हिसाब से उन्हें ना ही उतनी सैलरी मिलती है ना ही सुविधाएं। यही नहीं जान जोखिम में डालकर काम करने के बावजूद उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं किया जा रहा है। यही वजह है कि महाराष्ट्र की आशा वर्कर्स अनिश्चित समय के लिए हड़ताल पर चली गई हैं। पिछले काफी समय से वह अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं, लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं निकल पाया है।

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आशा वर्कर्स दुर्व्यवहार, डर, और असुरक्षा की जिंदगी के लिए मजबूर

asha worker strike

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार आशा वर्कर्स को ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते वक्त कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। आशा वर्कर सुमन ढेबे पिछले 9 सालों से पुणे के आसपास के गांवों में डाक्टर बाई के तौर पर काम कर रही हैं। कोरोना काल में वह बिना किसी पीपीई किट के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के घर-घर जाती हैं। दरअसल इन गांवों में पीपीई किट पहनकर चलना मुश्किल है। रोजाना 8 घंटे तक पहाड़ों पर चढ़ाई करने के बाद 45 वर्षीय सुमन लोगों के घर पहुंच पाती हैं। पहाड़ों पर चढ़ते वक्त उनके हाथ में एक डंडा होता है जिसकी मदद से उन्हें रास्ते में चलने में आसानी होती है। वहीं सिर्फ सुमन ढेबे ही नहीं बल्कि उनकी जैसी कई आशा वर्कर्स को इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार उनपर अटैक भी हो चुके हैं, हालांकि इन सब परेशानियों का सामना करने के बावजूद वह काफी साल से काम कर रही हैं।

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दिसंबर के बाद से नहीं मिला बोनस

asha woker salary

कोरोना काल में पहली लहर के दौरान आशा वर्कर्स को 300 रुपये रोजाना बोनस के तौर पर दिये गये थे, लेकिन पिछले साल दिसंबर के बाद से यह मिलना बंद हो गया। वहीं कोरोना की दूसरी लहर में भी इन्हें बोनस नहीं दिया गया है। बता दें कि आशा वर्कर्स कोविड के खिलाफ जंग में सबसे आगे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह अपनी बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले साल उन्होंने डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, और टेस्टिंग शिविर में काफी मदद की थी। इस दौरान उन्हें मास्क और ग्लव्स भी नहीं दिए जाते थे। यही नहीं कोरोना काल में जिन आशा वर्कर्स ने अपनी जान गवा दी, उन्हें मुआवजा के तौर पर कुछ नहीं दिया गया।

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