भारत में मनाए जानें वाले हर छोटे बड़े त्योहार को धूम-धाम से मनाया जाता है। इन्हीं में से एक त्योहार है अहोई अष्टमी। यह त्योहार भारत में रहने वाली लगभग हर हिंदू परिवार की महिला करती है। यह व्रत अमूमन वह महिलाएं रखती हैं जो संतान प्राप्ति कामना करती हैं या फिर अपनी संतान की लंबी उम्र की मनोकामना रखती हैं। आपको बता दें कि यह व्रत खासतौर पर उत्तर भारत में रहने वाली महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रीय है। इस लोकप्रीय त्योहार पर महिलाएं अपनी संतान के लिए देवी पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी संतान की उम्र लंबी होती है।  ऐसी भी मान्यता है कि जिन महिलाआं बच्चे नहीं हो रहे होते हैं वह भी यह व्रत रखती हैं और संतान होने के लिए देवी पार्वती की अराधना करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से जिन महिलाओं को संतान नहीं होती उन्हें संतान हो जाती है और जिन महिलाओं के संतान होती है उनकी आयु लंबी हो जाती है। आपको बता दें वर्ष 2019 में यह व्रत 21 अक्टूबर के दिन मनाया जाएगा। तो चलिए हम आपको इस व्रत को रखने की विधि, मुहूर्त और व्रत कथा के बारे में बताते हैं। 

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Kab Hai Ahoi Ashtami

शुभ मुहूर्त 

गौरतलब है कि अहोई अष्टमी हर वर्ष करवा चौथ के चौथे दिन और दिवाली से आठ दिन पूर्व ही आती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अहोई अष्टमी का पर्व कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मनाया जाता है। वर्ष 2018 में अहोई अष्टमी का पर्व 21 अक्टूबर के दिन होता है। आपको बता दें कि इस वर्ष 21 अक्टूबर को सुबह 6 बजकर 44 मिनट से अहोई अस्टमी शुरू होगी। यह 22 नवंबर सुबह 5 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। अहोई अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 21 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 42 मिनट से लेकर 6 बजकर 59 मिनट तक है। वहीं तारों को देखने का शुभ मुहूर्त 6 बजकर 10 मिनट पर है और चंद्रमा को देखने का शुभ मुहूर्त 11 बजकर 46 मिनट पर है।

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अहोई अष्टमी का महत्व 

उत्तर भारत में अहोई अष्टमी के पर्व विशेष महत्व है। इस त्योहार को इस क्षेत्र के कुछ लोग 'अहोई आठे' भी कहते हैं। ऐसा इस लिए क्योंकि यह पर्व अष्टमी के दिन होता है। इस दिन हिंदू महिलाएं जो इस पर्व को मनाती हैं वह निर्जला व्रत रखती हैं। यह व्रत करवा चौथ की तरह ही होता है। मगर, यह संतान के लिए रखा जाता है। इस त्योहार पर कुछ महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं तो कुछ महिलएं चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। जिन महिलाओं के संतान नहीं होती उनके लिए यह व्रत बहुत ही फलदायक होता है। 

Ahoi Ashtami  October Date

अहोई अष्टमी की पूजा विधि 

अहोई अष्टमी का व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन विधि विधान से पूजा करनी होती है। इस दिन सुबह सूर्यदय होने से पूर्व स्नान करके नए कपड़े पहनने होते हैं। इसके बाद मंदिर जाकर देवी पार्वती के आगे व्रत का संकल्प लेना होता है। इसके बाद घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता और उनके पुत्रों का चित्र बनाएं।  वैसे आपको यह चित्र बाजार में बने बनाएं भी मिल जाते हैं। अब चित्र के सामने चावल से भरा हुआ कटोरा, मूली, सिंघाड़े और दीपक रखें।  लोटे में पानी भर कर रखें और उसके उपर करवा रखें। इस करवे में भी पानी भर दें। आप करवा चौथ पर इस्तेमाल किए हुए करवे को ही दोबारा इस्तेमाल कर सकती हैं। इस करवे को पूजा के बाद फेंके नहीं बल्कि इसी करवे के पानी को दिवाली वाले दिन पूरे घर में छिड़क देना चाहिए। इसके बाद हाथों में चावल लें और अहोई अष्टमी व्रत कथा पढ़े। बाद में इस चावल को साड़ी के पल्लू में बांध लें। शाम के समय पूजा करते वक्त चित्र के आगे 14 पूरियां, आठ पुए और खीर चढ़ाएं। इसके बाद माता को लाला रंग का फूल चढ़ाएं। तारा निकलने पर उसे अर्घ्य दें और फिर बायना निकाल कर अपनी सास या फिर घर की किसी बड़ी महिला को दें और पैर छू कर उनका आशीर्वाद लें। Diwali 2019 Recipe: सीखें कलाकंद बनाने की सबसे आसान विधि

अहोई अष्टमी की  व्रत कथा 

अहोई अष्टमी के दिन यदि आपने व्रत रखा है तो इस प्राचीन कथा को सुने बगैर आपका व्रत पूरा नहीं होगा। चलिए हम आपको इस कथा के बारे में बताते हैं। आहेई अष्टमी व्रत कथा बुक में यह कथा इस प्रकार लिखी हुई है, 

‘प्राचीनकाल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थीं. साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी. दीपावली पर घर को सजान के लिए सतों बहुएं मिट्टी लेने जंगल गईं साथ में नंद को भी ले गईं। जंगल में जहां साहुकार की बेटी मट्टी निकाल रही थी वहीं एक महिला स्याहू अपने सात बेटों के साथ रहती थी। गलती से साहुकार की बेटी का खुरपा स्याहू के एक बच्चे का लग गया। इससे उस बच्चे की मृत्यु हो गई। बच्चे की मौत से बौखलाई स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली, "मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी तुम्हें कभी संतान सुख नहीं मिलेगा।" स्याहू का श्राप सुन कर भाभियों संग साहूकार की बेटी स्याहू से विनती करने लगी। नंद की जगह सातों भाभियों में से एक अपनी कोख बंधवाने को तैयार हो जाती है। इसके बाद भाभी के जो भी बच्चे होते सात दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाती। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। हर बार गाय सेवा से प्रसन्न होकर उसे स्याहू के पास ले जाती तब जाकर स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहू होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा-भरा हो जाता है।’ Diwali 2019: दिवाली के त्योहार से जुड़े इन रोचक प्रश्नों का उत्तर क्या जानते हैं आप?