आज हम मां के बारे में बात कर रहे हैं। जी हां, कहने को तो बहुत छोटा सा शब्द है लेकिन इसमें पूरा संसार समाया हुआ है। दुनिया में मां का दर्जा भगवान से बढ़कर हैं क्योंकि भगवान भी मां के सामने अपना सिर झुकाते हैं। मां के लिए कुछ वाक्य मैंने लिखे हैं क्‍योंकि मां बनकर ही मैंने इसे समझा है। 

जब मैं एक नन्‍हीं बच्‍ची थी, मां के आंचल में रहती थी।

हर पल मुस्‍कुराती मेरी मां, नजरों में समाई रहती थी। 

मैं हंसती थी, वो हंसती थी, मैं रोती तो वो भी व्‍याकुल हो जाती थी। 

 

वो मेरा नखरे करना और बात-बात पर रूठ जाना

फिर मां का नाज उठाना और हंसकर मेरा मान जाना। 

सुबह-सुबह आकर मां का मेरे बालों को सहलाना

और दूध का प्‍याला संग लाना और फिर होले से मुस्‍कुराना। 

motherhood so special Hervoice Inside

 

वो मेरी संग सहेली थी, हर दम मुझको सिखलाती थी

हर पल वह निहारा करती थी, और मैं हर पल इठलाती थी। 

वक्त गुजारा और गुजर गया, मेरे उर नन्‍हा एक फूल खिला। 

 

मैं भी एक मां हूं आज, पर शायद मैं उतनी सुखी नहीं, 

क्‍योंकि मेरे और बच्‍चों के चेहरे पर वो सुकून की हंसी नहीं। 

न ही वह हंसी ठिठोली है न ही उतना नखरे करना। 

 

न बात-बात पर रूठ जाना और हंसकर यूं ही मान जाना। 

मुझे याद है मेरा नन्‍हा, मुझे याद है मेरा नन्‍हा, उसका मुस्‍कुराना

हर पल मेरा उसका ताकना और निहाल हो जाना। 

 

पर जब लगता कि जाना है कि मुझको तो अपने ऑफिस, 

बस झटपट सब करना, घर के कामों को निपटाना। 

 

लेखक- सुषमा सिंह 

(सुश्री सुषमा सिंह, भारत मौसम विज्ञान विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में कार्यरत, विद्यावाचस्पति और विद्या सागर की मानद उपाधि से विभूषित है। कविताएं, गीत, छंद, बाल कविताएं, कहानी, लघुकथाएं और यात्रा वृत्तांत आदि लिखती हैं।)