फूलों सी खिलती, महकती-महकाती

रुनझुन पायल सी गाती-गुनगुनाती

हम बेटियाँ

 

होली पर रंगों को रंगत देती

दीपावली पर दीपों सी झिलमिलाती

हम बेटियाँ

 

खुशी में उसको दूना करती,

दुख में सहलाकर सुख पहुंचाती

हम बेटियाँ

 

सावन के झूलों की पींगों में

तीजों पर चूड़ियां खनकाती

हम बेटियाँ

 

जहां जातीं, मेहंदी सी रच बस जाती

बगिया में तितली सी इठलाती

हम बेटियाँ

 

सर्दी में गुनगुनाती धूप सी

गर्मी में ओस सी ठंडक दे जाती

हम बेटियाँ

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जब होती सयानी तो

कंचों सी उछाल दी जाती

हम बेटियाँ

 

गिरती संभलती, सब को संभालती

दो घरों की लाज बचाती

हम बेटियाँ

 

अपनों की थोड़ी सी सिसकी पर दौड़ी चली आतीं,

पर अपना हर दुख, हर गम छुपा जाती

हम बेटियाँ

 

खुशियों के अनमोल पलों को, 

मुट्ठी में बंद कर सपनों की दुनिया में जीती चली जाती

हम बेटियाँ

 

मटमैला कर खुद को, घर आंगन को बुहारती सँवारती

प्यार के कच्चे धागों से, तुरपती संबंधों को 

पक्का करतीं

हम बेटियाँ

 

हम न हमेशा दिखेंगी तुम्हारे आंगन में, 

पर हलवे में चीनी सी और सब्जी में नमक सी घुली 

हम बेटियाँ

 

संभलते संभालते खुद के लिए, कुछ लम्हे निकालने को,

मुट्ठी से रेत सी फिसलती

हम बेटियाँ।

 

लेखक - सुषमा सिंह

(सुश्री सुषमा सिंह, भारत मौसम विज्ञान विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में कार्यरत, विद्यावाचस्पति और विद्या सागर की मानद उपाधि से विभूषित है। कविताएं, गीत, छंद, बाल कविताएं, कहानी, लघुकथाएं और यात्रा वृत्तांत आदि लिखती हैं।)