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    अपनी बेटी की स्ट्रिक्ट मदर से लेकर दोस्त बनने तक का मेरा सफर कुछ ऐसा रहा, जानें

    अपनी बेटी को समझने के लिए उसकी तरह से सोचना बेहद जरूरी होता है ताकि आप उसे समझ पाएं।
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    • Editorial
    Updated at - 2022-11-21,20:07 IST
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    मेरा नाम कामिनी है और मेरी उम्र 55 साल है। मैं एक हाउसवाइफ हूं और अपनी फैमिली के लिए हर दम तैयार रहती हूं। मेरे दो बच्चे हैं- एक बेटा और एक बेटी। वहीं आजकल बच्चे अपने मन की करना पसंद करते हैं, जिसके कारण कई बार हम जैसी मां बेहद गुस्सा भी हो जाती हैं। ऐसे ही मैं अपनी बेटी के लिए शुरू से ही बेहद सख्त मिजाज की थी, लेकिन शायद मेरा स्वभाव काफी स्ट्रिक्ट होने के कारण मैं अपने बच्चों के करीब आने की जगह पर उनसे और भी दूर जा रही थी। जब मेरा बेटा हुआ तो मैंने दोनों बच्चों को देखा और समझा की शायद मैं ही अपनी बेटी के साथ काफी स्ट्रिक्ट थी, जिसकी वजह से उसने मुझसे बात करना ही बंद कर दिया। इसलिए मैंने अपने बर्ताव में कई तरह के बदलाव किए। 

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    ऐसे ही एक बार मेरी बेटी किसी बात को लेकर बेहद परेशान थी, लेकिन वह मुझसे ये सब शेयर नहीं करना चाहती थी। इसी वजह से वो मुझसे तो क्या घर में किसी से भी बात नहीं कर रही थी। यहां तक की खाना खाने से लेकर फैमिली टाइम तक के लिए मेरी बेटी ने साथ बैठना बिल्कुल ही बंद कर दिया।  वहीं मेरा बेटा खुलकर अपनी बात मेरे सामने कहता था।इसी कारण मैंने खुद को बदलने की कोशिश की और उसे समय देना शुरू किया। साथ ही उसकी तरह से सोचना भी शुरू कर दिया। ऐसा करने से उसे पहले मेरे बर्ताव में थोड़ा बदलाव लगा और शायद उसे अजीब भी लगा, लेकिन वो धीरे-धीरे मेरे साथ खुलने लगी और अपनी बातें भी मुझसे शेयर करने लगी।

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    जहां तक मुझे लगता है कि शायद मेरी बेटी इस बात से डरती थी कि कहीं मां को मेरी बात बुरी न लग जाए या मैं इस बात को जानकार कैसा रिएक्शन दूंगी। उसे शायद ये भी लगता था कि कहीं मैं उसे सपोर्ट ही न करूं तो ? जब मैंने अपनी बेटी को हर तरह से सपोर्ट किया और उसे समझने के लिए उसी कि तरह से सोचा और गुस्सा करने की जगह एक दोस्त के जैसे उसे प्यार से समझाया ताकि वो मुझसे डरे बिना आपने मन की बात खुलकतर बता पाए।

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    कई बार मुझे ऐसा भी लगता है कि मेरे स्ट्रिक्ट स्वभाव के कारण मेरी बेटी डिप्रेशन में भी जा रही थी और इसी वजह से शायद उसने साथ बैठना तक छोड़ दिया था, लेकिन अब जब से मैंने उसे खुलकर जीने की आजादी दी और उसे समझा, तो मानों मैं और मेरी बेटी बेस्ट फ्रेंड जैसे बन गए हैं। आज हम एक दूसरे की तरह कपड़े भी पहनते हैं। साथ ही उसने मुझे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना भी सीखाया है। मेरी बेटी की सहेलियां भी मुझे एक दोस्त की तरह ही ट्रीट करती हैं और हम सब एक ग्रुप बना कर कई जगहों पैर घुमने भी जाते हैं।

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