आज के कठिन दौर मे (कोरोनाकाल) जब न जाने कितने अंजान लोग कितने ही अनजानों की मदद के लिए आगे आए। वहीं रिश्तों में एहसान शब्द भी वायरस की तरह फैल गया। हम सबने देखा लोगों ने सोशल मीडिया, दोस्तों या दोस्तों के दोस्तों, पड़ोसियों से मदद मांगी औऱ जो अपने स्वास्थ्य से मजबूर नही थे या कोरोना के प्रभाव से कम पीड़ित थे उन्होंने बढ़ चढ कर एक दूसरे का हाथ थामा।

लेकिन इसी मदद की जद्दोजहद में कब "एहसान" शब्द मुंह फाड़ के रिश्तों के बीच खड़ा हो गया पता ही नही चला। वजह बस ये थी कि ये बीमारी ऐसी है कि  आप बाहर जा नही सकते औऱ अत्याधिक कमजोरी की वजह से आप कुछ कर भी नही सकते। हालांकि, हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन लोगों के लिए जिन्होंने हमारी कठिन वक़्त में मदद की।

किंतु जब रिश्ते उस एहसान को इस क़दर जताते हैं कि वह हमारे मन चोटिल ही कर दें तो उस पर कोई एंटीबायोटिक भी असर नही करती है। तो तैयार रहिए एहसानों की गठरी को अपने सर पर रखने के लिए। आइए जानते हैं उन एहसानों के प्रकार जो लोगों ने कोरोना काल में जताने शुरू कर दिए और कोरोना पीड़ित इंसान इन एहसानों तले मानो डाब सा गया हो।

1) दवाइयों को घर पहुंचाने का एहसान

समाज में कुछ लोग मजबूरी में या समाज को दिखाने के लिए ही आपकी मदद करते हैं। जो कि अपने द्वारा दी गई छोटी- छोटी  सहायताओं को वक़्त आने पर ट्रम्प कॉर्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं जैसे एक रोगग्रस्त को दवाइयां पहुचाने वाली बात भी वह अपने एहसानों वाली डायरी में लिख लेते हैं और वक्त आने पर जाहिर कर ही देते हैं कि- भाई अगर हमने मदद न की होती तो आपको दवाइयां भी न मिलतीं।

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2) खाना पकाने औऱ पहुंचाने का एहसान

इस एहसान तले तो हर घर दब चुका है। लोग टिफ़िन या बाहर से खाना इसलिये नही मंगाते ताकि उन्हें घर के खाने से रिकवरी जल्दी मिले । पर रोटी बनाने वाले ने मन ही मन आपके ऊपर दो रोटी के एहसान की पोटली बांध कर जग में अपने बखान गाना कब शुरू किया आपको पता ही नही चला।

3) आर्थिक सहायता का एहसान

लॉकडाउन के चलते सभी की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ी हुई थी। किंतु कुछ लोग जिनका आर्थिक स्तर हमेशा से अच्छा रहा वो आर्थिक सहायता पहुँचाने की  बात सोशल मीडिया पर डालने से भी नही चूके।

4) आवश्यक कॉन्टैक्ट डिटेल्स शेयर करने का एहसान

डॉक्टर के नम्बर से लेकर अस्पताल का नम्बर देने के बाद लोगों ने ये गाना शुरू किया कि उनकी वजह से ही तो आप ठीक हुए हैं। फिर भला ये एहसान कोई याद क्यों न रखेगा।

5) फ़ोन पर हालचाल पूछने का एहसान

हम तो दिन रात फ़ोन करके हाल चाल लेते रहे। यकीन मानिए इस कलयुग में ये भी किसी एहसान से कम नहीं है कि कोरोना काल में इतने व्यस्त होने के बाद भी दोस्तों और रिश्तेदारों ने फोन करके आपका हालचाल लिया और गेट वेल सून का मैसेज भी भेजते रहे।

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6) आफिस में सहायता का एहसान

तुम्हारे ज़रूरी डॉक्युमेंट न पहुंचे होते तो तुम्हारी नौकरी पर बन आती। अरे जब घर वाले और रिश्तेदार एहसान जाता ही रहे थे तो भला ऑफिस वाले पीछे क्यों रह जाते?  वास्तव में अगर उस समय ऑफिस के सभी कलीग्स की मदद न मिली होती तो इस महामारी से निकलना मुश्किल ही तो था।

7) बाजार से सामान लाने का एहसान

दौड़ धूप करके हमने सामान इनके घर सामान पहुँचाया।  वर्ना भला क्वारेंटाइन समय में कहाँ से जरूरत की चीज़ें मंगवा पाते ?

तो दोस्तों ये तो हो गयी एहसान जताने वालों की लिस्ट। लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग सहायता के लिए खड़े रहे जिन्हें वास्तव में हम दिल से शुक्रिया करना चाहते हैं और जिनको वाकई नहीं लगता है कि उन्होंने हम पर एहसान किया बल्कि वो वक़्त की ज़रूरत थी और जरूरत का वक़्त। यदि आप उन सबको शुक्रिया करना चाहते हैं तो जरूर उन दिल से खूबसूरत लोगों को इसपोस्ट पर टैग करें।

लेखक- दीपाली किरन

लखनऊ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने और कई पब्लिशिंग हाउस में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करने के साथ दीपाली किरन कई रोचक पुस्तकों जैसे "जब मन छलके"और "कहानियों का ठेला" की लेखिका हैं। लेखन इनका शौक ही नहीं बल्कि जूनून भी है।