हाल ही में पुलवामा में सेना के जवानों पर हुए घातक हमले में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों की संख्या बढ़कर 46 हो गई है। सेना पर घात लगाकर किए गए इस हमले ने कई परिवारों को बेसहारा कर दिया, कई मां से उनकी जिंदगी का नूर, पत्नियों से उनका जीवनसाथी और बच्चों से उनके पिता का साया छीन लिया। ऐसे मुश्किल वक्त में शहीद के परिवारों के लिए बहुत मुश्किल घड़ी होती है। सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है शहीद की पत्नी की स्थिति, जिसके आगे एक लंबा जीवन होता है और संभालने के लिए मासूम बच्चे। शहीद की पत्नी को अपने बच्चों के लिए मजबूत होना पड़ता है, लेकिन भीतर से वह भी बिखर चुकी होती है।

देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली जवानों की पत्नियां भी उनसे कम बहादुर नहीं होतीं। एक भीषण ऑपरेशन के लिए गए एक सैन्य अफसर की पत्नी की ऐसी ही दास्तां आज हम आपको सुनाने जा रही हैं खुद उन्हीं की जुबानी। इस बेहद स्ट्रॉन्ग और इंस्पिरेशनल वुमन का नाम है सलमा शफीक गोरी। तो आइए जानते हैं इनकी जिंदगी की कहानी, इन्हीं की जुबानी-

जाना सैन्य अफसर की पत्नी होने का मतलब

जब मैं 19 साल की थी, मेरी शादी कैप्टन शफीक गोरी से 1991 में हुई थी। शुरुआत में मेरे लिए खुद को समझाना मुश्किल था कि वह लगातार सफर पर रहेंगे और मुझे एक लंबा अरसा अकेले गुजारना होगा। जब मेरे पति को मेरी मुश्किल का अहसास हुआ तो उन्होंने मुझे समझाया कि सेना से जुड़े अफसर की पत्नी होने का मतलब क्या होता है। उस समय में कोई मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। मैं घंटों फोन के पास बिता देती थी इस उम्मीद में कि वो मुझे कॉल लगाएं। हम एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखा करते थे। मेरे पति ने नियम बनाया था कि हर रोज उनकी एक चिट्ठी मुझे मिले। मैं छोटे नोट्स लिखा करती थी और उनके सामान में सरप्राइजेज रख देती थी।

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उनका पहला प्यार था भारत देश

आने वाले सालों में उनकी जहां-जहां पोस्टिंग हुई, उसमें से कई काफी जोखिम वाली जगहें थीं। तब पंजाब और पूर्व के राज्य बहुत खतरनाक हुआ करते थे। मेरे पति की पोस्टिंग त्रिपुरा, पंजाब और श्रीनगर में हुई। काफी लंबी अवधि तक वह अपनी पोस्ट्स पर रहते थे, लेकिन तब तक मैं काफी मजबूत बन चुकी थी, अपना और अपने बच्चों का खयाल रखना सीख गई थी। मैं जानती थी कि उन्हें अपने देश से बहुत प्रेम है और उसके बाद दूसरे नंबर पर थे पत्नी और बच्चों का जो पहले प्रेम से बस थोड़े ही दूर थे। 

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इस बात का रह गया अफसोस

1999 में मेरे पति की पोस्टिंग श्रीनगर में थी। चूंकि यह हिस्सा हाई रिस्क वाला था, इसीलिए यहां परिवारों के आने की अनुमति नहीं दी गई थी। मैं बैंगलोर शिफ्ट हो गई। जून 28, 20001 को हमारी आखिरी बार बात हुई। मेरे पति ने मेरा और बच्चों का हालचाल पूछा, उन्होंने बताया कि वह जंगल में हैं एक मिलिटरी ऑपरेशन के लिए। वह बच्चों से बात करना चाहते थे, लेकिन बच्चे उस दौरान अपने कजिन्स के साथ थे और उनके पीछे से काफी शोर आ रहा था। मैंने उनसे कहा था कि वह बेस पर पहुंच जाएं और उसके बाद बच्चों से बात करें। मुझे अब तक इस बात के लिए अफसोस होता है कि मैंने बच्चों से उनकी बात क्यों नहीं कराई, क्यों उनसे बाद में बात करने के लिए कहा। 

सोचा ना था कि ऐसा होगा

1 जुलाई, 2001 की बात है। लगभग 6.30 बजे आर्मी के अफसर अपनी पत्नियों के साथ मेरे घर आ गए। तभी एक महिला ने मुझे बिठाया और कहा, 'मेजर गोरी नहीं रहे।' मुझे लगा कि मैंने शायद गलत सुना है। शायद उनसे गलती हुई है। लेकिन उनसे कोई चूक नहीं हुई थी। वह महिला कह रही थी कि वह मुझसे सुबह से बात करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बात नहीं हो पाई, क्योंकि मैं अपनी मां के घर पर थी और फोन लाइन कटी हुई थी। मेजर शफीक गोरी ऑपरेशन रक्षक के दौरान शहीद हो गए थे। मुझे ऐसा लगा कि मेरे आसपास सबकुछ बिखर रहा है, टूट रहा है। उस दिन मुझे उनकी आखिरी चिट्ठी मिली थी। दूसरे दिन मैं एयरपोर्ट पर उन्हें आखिरी बार लेने पहुंची। इस बार वह भारतीय तिरंगे में लिपटे एक बॉक्स में थे। मैं पूरी तरह से टूट गई थी। वह मुझे हमेशा स्ट्रॉन्ग रहने के लिए कहते थे। आखिरी बार जब उनसे बात की थी, तो उस दिन भी उन्होंने मुझे स्ट्रॉन्ग रहने के लिए कहा था, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह साथ नहीं होंगे। 

महिला सशक्तीकरण के काम में हुई शामिल

मुझे उनकी यूनिफॉर्म और सिविल कपड़े एक बॉक्स में मिले। उनके कपड़ों को मैंने धोया नहीं, क्योंकि मैं उनकी यादों को खुद से जुदा नहीं होने देना चाहती थी। उनकी जेब में जो पैसे पड़े थे, आज भी वैसे ही रखे हुए हैं। उनकी लिखी चिट्ठियों को मैं आज भी पढ़ती हूं। मैंने अपने बच्चों के लिए मां और बाप दोनों की भूमिका निभाई है, लेकिन मेरे लिए तब खुद को संभालना मुश्किल हो जाता था, जब मैं दूसरे बच्चों को उनके पेरेंट्स के साथ खेलते देखती थी। आज मैं शहीद जवानों के परिवारों के वेलफेयर और शहीदों की विधवाओं के सशक्तीकरण के लिए कर्नाटक में काम करती हूं। जब मेजर शफीक गोरी शहीद हुए, तब मैं सिर्फ 29 साल की थी। लोगों ने मुझे जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कहा, लेकिन वह कल भी मेरे साथ थे, आज भी मेरे साथ हैं और हमेशा मेरे साथ रहेंगे।