आप पैडमेन से तो मिली होंगी, अब मिलिए हमारे देश की पैडवुमन से, जो मासिक धर्म से जुड़े तमाम मिथक को समाज से मिटाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। बचपन से ही जटिलताओं से जूझने के बाद, ग्रामीण महिलाओं को मेंस्ट्रुअल हाइजीन के बारे में शिक्षित करने के उद्देश्य से वह कैलिफोर्निया से भारत वापिस आईं। आज वह सबके लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। उन्होंने सुकर्मा फाउंडेशन की स्थापना की, इसके जरिए वह महिलाओं को हाइजीन के बारे में शिक्षित कर रहीं है और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए मदद कर रही है। आइए उनके बारे में और जानें।

कैसे हुई शुरुआत

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक गांव की रहने वाली, माया विश्वकर्मा के माता-पिता खेतिहर मजदूर थे। फिर भी, उन्होंने माया को पढ़ाई से रोकने या शादी के लिए मजबूर करने की कोशिश नहीं की। माया विश्वकर्मा ने जबलपुर के एक विश्वविद्यालय से बायोटेक्नोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएकशन किया और एम्स. दिल्ली में रिसर्च भी किया और फिर वह कैलिफॉर्निया चली गईं। मगर वह संतुष्ट नहीं थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, 'मैं वहां बिल्कुल संतुष्ट नहीं थी और अक्सर अपने गांव नरसिंहपुर आ जाया करती थी। मुझे लगा जैसे मैं अपने साथ किसी तरह का अन्याय कर रही हूं। इसलिए मैंने वापस आने और कुछ सामाजिक कार्य करने का फैसला किया, ताकि जिन लोगों को सच में मदद की जरूरत है, मैं उनके काम आ सकूं।' इस तरह सुकर्मा फाउंडेशन की स्थापना हुई। तब से वह भारत में घूम-घूम कर महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन और उसके मिथ के प्रति जागरूक कर रही है।

 
 
 
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26 साल की उम्र तक खुद सैनिटरी नैपकिन्स से थीं अनजान

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जब मैं अपने रिश्तेदारों के साथ रह रही थी और मुझे पीरियड्स हुए थे, तो मैं उनसे इस बारे में बात नहीं कर सकती थी। इस बारे में बात करने के लिए भी हमें बहुत सोचना पड़ता था क्योंकि यह एक बड़ा टैबू था। वह 26 साल की उम्र में भी उन्हें नहीं पता था कि सैनिटरी पैड क्या होते हैं, क्योंकि उनके रिश्तेदारों की सलाह पर सिर्फ कपड़ा इस्तेमाल करती थीं। जिस वजह से उन्हें सेहत से जुड़ी कई समस्याओं से भी गुजरना पड़ा। उन्होंने बताया, 'इसी वजह से मैंने मासिक धर्म स्वच्छता अभियान शुरू किया, जहां मैं सैकड़ों लड़कियों को शिक्षित करने के लिए 15 आदिवासी जिलों में भी गई। हमने सूचनात्मक कार्यशालाओं और सेमिनार्स का आयोजन किया। मैंने यह भी महसूस किया कि स्वास्थ्य संस्थान हमारे समाज का एक अभिन्न अंग हैं, जो हमारे क्षेत्र में मौजूद नहीं था। इसलिए, हमने एक क्लिनिक शुरू किया, जहां लोग, विशेष रूप से महिलाएं बिना हिचक के आ सकती हैं।'

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क्राउडफंडिंग के जरिए शुरू हुआ फाउंडेशन

मशीन और यूनिट के लिए क्राउडफंडिंग के जरिए पैसा जमा किया गया। माया ने कुछ अपने सेविंग्स, और कैलिफोर्निया में रह रहे अपने दोस्तों की मदद से सुकर्मा फाउंडेशन के लिए और पैसा जोड़ा। सैनिटरी पैड बनाने के लिए सबसे अच्छी और लागत प्रभावी मशीनरी की तलाश में वह कुछ समय पहले रियल पैडमैन मुरुगनाथम से मिलीं। अब फाउंडेशन कम और सस्ती कीमत पर सैनिटरी नैपकिन भी बनाती है और इन महिलाओं को देती है। इसके माध्यम से, वह सैनिटरी नैपकिन के उपयोग के महत्व के बारे में जागरूकता पैदा करती है और महिलाओं को सस्ती कीमत पर बनाती और प्रदान करती हैं।

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मुश्किलों से भरा था उनका सफर

चुनौतियां हमेशा होती हैं। यदि आप सामान्य रास्ते से अलग रास्ता अपनाना चाहते हैं, तो यह आसान नहीं होगा। एक लड़की होने और एक दूरदराज के इलाके में बढ़ने के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। लोग इसे बकवास समझेंगे। इसलिए महिलाओं को संदेश को संप्रेषित करने और उनके माध्यम से मार्गदर्शन करने के लिए सही आवाज और माध्यम की आवश्यकता थी, जो ज्यादातर संगठित कार्यशालाओं और बैठकों के माध्यम से संभव था। ग्रामीण महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराना और उन्हें उनकी समस्याओं का समाधान करने की सलाह देना हमेशा मुश्किल रहा।

 
 
 
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माया बताती हैं, 'अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में, आधी महिला आबादी अभी भी अपने चेहरे को ढंक लेती है ताकि कोई उन्हें देख न सके। लेकिन, बदलाव हो रहे हैं। मैंने युवा बहुओं को अब स्वतंत्र रूप से काम करते देखा है।' अपनी सफलता और भरत की पैडवुमन के नाम से पहचान बनाने पर वह कहती हैं, 'सफलता और असफलता मेरी सूची में नहीं हैं। जब लोग मुझे मेरे काम और सुकर्मा फाउंडेशन के लाभों के बारे में बताते हैं, तो मुझे वास्तव में यही अविश्वसनीय लगता है!'

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