क्या आप जानती हैं कि भारत की 3.4 फीसदी जनसंख्या थैलेसीमिया से पीड़ित है और हर महीने लगभग 1 लाख मरीजों को ब्लड ट्रांसफ्यूशन की जरूरत पड़ती है। इतनी बड़ी संख्या में थैलेसीमिया पेशेंट होने की वजह से भारत को थैलेसीमिया कैपिटल भी कहा जाता है। थैलेसीमिया एक जेनेटिक डिसऑर्डर है, जिसमें हीमोग्लोबिन की फॉर्मेशन असामान्य हो जाती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की आवाजाही प्रभावित होती है और रेड ब्लड सेल्स नष्ट हो जाते हैं। रेड ब्लड सेल्स कम होने की वजह से माइल्ड या गंभीर एनीमिया हो सकता है। थेलेसीमिया मेजर से पीड़ित महिलाएं गंभीर एनीमिया से भी पीड़ित होती हैं और ऐसी महिलाओं को जल्दी-जल्दी ब्लड ट्रांसफ्यूशन की जरूरत होती है।

दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम हो सकती हैं

थैलेसीमिया की वजह से दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम्स होने की आशंका भी बढ़ जाती है मसलन डीलेड प्यूबर्टी, बोन डीफॉर्मिटी, आयरन ओवरलोड, कार्डियोवेस्कुलर डिजीज, हार्ट पल्पिटेशन, गाल और माथे की हड्डी का बढ़ना, लीवर का बढ़ना, जॉन्डिस, स्पलीन का बढ़ जाना। कुछ अहम जीन्स की फ्रेगमेंट्स की वजह से जेनेटिक म्यूटेशन या डिलीशन हो जाता है और यही स्थिति थैलेसीमिया को जन्म देती है।

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इन लक्षणों से पहचानें थैलेसीमिया

त्वचा पर पीलापन,  डार्क यूरीन, डीलेड ग्रोथ और बहुत ज्यादा थकान। हालांकि हर किसी में थैलेसीमिया के लक्षण नजर नहीं आते। थैलेसीमिया के कुछ लक्षण बचपन के बाद की अवस्था या टीनेज में नजर आते हैं।

इन वजहों से होता है थैलेसीमिया

थैलेसीमिया मम्मी-पापा के जरिए बच्चों को हो जाता है। अगर आपके मम्मी-पापा को थैलेसीमिया की समस्या रही है तो आपको थैलेसीमिया माइनर हो सकता है। अगर बच्चे के मम्मी-पापा दोनों ही थैलेसीमिया से पीड़ित हैं तो बच्चे को ज्यादा सीरियस थैलेसीमिया होने की आशंका होती है।

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कितनी तरह का होता है थैलेसीमिया

बीटा थैलेसीमिया

बीटा थैलेसीमिया तब होता है जब शरीर में बीटा ग्लोबिन नहीं हो बन पाता। इसमें भी दो तरह का थैलेसीमिया होता है एक थैलेसीमिया मेजर और दूसरा थैलेसीमिया इंडरमीडिया। थैलेसीमिया मेजर काफी खतरनाक होता है और इसमें जान जाने का जोखिम होता है। इसमें जल्दी-जल्दी इन्फेक्शन होना, भूख ना लगना, जॉन्डिस और कई ऑर्गन्स बढ़े हुए जैसे लक्षण नजर आते हैं।

वहीं थैलेसीमिया इंटरमीडिया उतना खतरनाक नहीं होता और यह तब होता है जब बीटा ग्लोबिन जीन्स में टकराव होता है। इससे पीड़ित मरीजों को रेगुलर ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं होती।

एल्फा थैलेसीमिया

इसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में एल्फा ग्लोबिन नहीं बना पाता। इसके सबटाइप्स हैं हीमोग्लोबिन एच और हाइड्रॉप्स फीटेल्स। हीमोग्लोबिन एच से गाल, माथा और जबड़े सामान्य से ज्यादा बढ़ जाते हैं। वहीं हाइड्रॉप्स फीटेल्स एक गंभीर किस्म का थैलेसीमिया है, जो बच्चों में जन्म से पहले हो जाता है और इसकी वजह से उनकी मौत होने की आशंका भी बढ़ जाती है।

अगर आप सुरक्षित स्रोत से ब्लड सप्लाई बनाए रखें तो आप इस खुद को सुरक्षित रख सकती हैं। हालांकि ब्लड डोनेशन से जुड़े कई मिथ प्रचलित हैं जैसे कि खून देने से कमजोरी हो जाती है, लोग बीमारी हो जाने हैं आदि की वजह से थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को वॉल्यूंटरी ब्लड डोनर मिलने में परेशानी होती है। इससे उनकी लाइफ के लिए रिस्क भी बढ़ जाता है। जब ब्लड ट्रांसफ्यूजन हो तो यह सुनिश्चित करें कि वह एचआईवी हैपिटाइटिस वायरस और दूसरे संक्रमण से सुरक्षित हो। 

  • थैलेसीमिया से पीड़ित होने पर डॉक्टर्स विशेष रूप से ये सलाह देते हैं-
  • नियमित रूप से डॉक्टर से चेकअप कराएं।
  • दोस्तों से बातचीत के साथ-साथ अपना सपोर्ट सिस्टम भी बनाकर रखें।
  • अच्छी हेल्थ के लिए हेल्दी डाइट मेंटेन करें।
  • अपनी कंडिशन के अनुसार हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें।