पीसीओएस/पीसीओडी एक कॉमन फीमेल एंडोक्राइन डिसऑर्डर है, जो 20 प्रतिशत महिलाओं को उनके रिप्रोडक्टिव उम्र में प्रभावित करता है। इस वजह से महिलाओं में प्राइमरी और सेकेंडरी इनफर्टिलिटी की संभावना बढ़ जाती है। आयुर्वेद एक्सपर्ट डॉ. जैना विशाल पटवा बताती हैं, 'यह एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें हमारे अंडाशय, उच्च मात्रा में एंड्रोजेंस बनाने लगते हैं, जो ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन का लेवल बढ़ाते हैं और फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हार्मोन का लेवल घट जाता है। यह फॉलिकल को मैच्योर अंडे बनाने से रोकता है, जिससे पीरियड्स रेगुलर नहीं होते हैं।'

आयुर्वेद इसमें कैसे मदद करता है, इस पर उन्होंने बताया, ‘आयुर्वेद आपके रिप्रोडक्टिव चैनल से ब्लॉक्स को हटाता है और इस तरह आपके हार्मोन नेचुरली काम करना शुरू कर देते हैं। इसके लिए इंफर्टोक्स ट्रीटमेंट किया जाता है, जिसमें डाइट, हर्ब्स और कुछ प्राचीन डिटॉक्स थेरेपी के उपचार से आपके शरीर से टॉक्सिन चीजों को बाहर निकाला जाता है।’ ये चीजें कैसे होती हैं, और पीसीओएस को कैसे टैकल किया जा सकता है, आइए विस्तार से जानें।

 हरी सब्जियों को करें डाइट में शामिल

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पालक और अन्य पत्तेदार साग फोलिक एसिड का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं जो फर्टिलिटी को बूस्ट करता है। यह हेल्दी ओवम प्रोडक्शन में भी मदद करता है। इसके साथ ही अपने आहार में बेरीज को भी शामिल करना चाहिए, क्योंकि वह एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं और शरीर को सेल डैमेज से बचाती हैं। वहीं यैम विटामिन का अच्छा स्रोत होने के साथ-साथ में ओव्यूलेशन स्टीमुलेशन में भी मदद करता है।

कैसी हो आपकी डाइट

डॉ. जैना कहती हैं कि आपकी डाइट एक हेल्दी प्रपोशन के साथ तैयार होनी चाहिए। आपको अपनी डाइट में 60 प्रतिशत सब्जियां और 30 प्रतिशत प्रोटीन रिच फूड्स को शामिल करना चाहिए। होल ग्रेन्स जैसे की ओट्स, ब्राउन राइस, होल व्हीट, क्विनोआ जैसी चीजों को शामिल करें। इसमें बी और ई जैसे महत्वपूर्ण विटामिन होते हैं, जो आपके सेलुलर रिप्रोडक्शन और हार्मोनल बैलेंस के लिए बहुत जरूरी हैं।

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डाइट में प्रोटीन की मात्रा

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बीन्स, मटर, मूंगफली, मछली, चिकन, मूंग और दाल जैसे प्रोटीन अमीनो एसिड का एक समृद्ध स्रोत हैं जो मांसपेशियों और रिप्रोडक्टिव एग्स के लिए अच्छे हैं। इन खाद्य पदार्थों में आयरन का समृद्ध स्रोत एनीमिया को रोकने में मदद करता है, ओवुलेटरी इनफर्टिलिटी के जोखिम को कम करता है और लाल रक्त कोशिकाओं के कार्यों में सुधार करता है।

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इन चीजों को खाने से बचें

इस डाइट में ब्रेड, पिज्जा, पास्ता, चपाती, भाकरी और चावल से परहेज करना चाहिए। केक, डेसर्ट, सोडा जैसे मीठे खाद्य पदार्थों से बचें। इसके अलावा फैटी फूड्स जैसे पोर्क और बीफ, तले हुए खाद्य पदार्थ, मसालेदार भोजन, मैदा आदि चीजों को भी अवॉयड करना चाहिए।

नियमित रूप से योग करना है जरूरी

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योग पूरे रिप्रोडक्टिव सिस्टम को टोन करने में मदद करता है। धनुरासन, उत्तानपादासन, बद्धाकोनासन, उष्ट्रासन, वृक्षासन और वज्रासन जैसे आसन उन योग आसनों में से हैं जो महिलाओं को नियमित और स्वस्थ मासिक धर्म विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

बटरफ्लाई स्ट्रेच और प्राणायाम के साथ इन आसनों का नियमित रूप से अभ्यास करने से आप में मांसपेशियों की ताकत विकसित होगी, ये आसन मोटापे से दूर रखेंगे और अपने हार्मोन को संतुलित रखते हुए हेल्दी रिप्रोडक्टिव ऑर्गन का विकास होगा।

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जड़ी बूटियों का सेवन

पीसीओएस के आयुर्वेदिक उपचार में हार्मोन का संतुलन बनाए रखने के लिए अक्सर विशिष्ट जड़ी-बूटियों का उपयोग भी शामिल होता है।

अश्वगंधा : अश्वगंधा एक जड़ी बूटी है जिसे भारतीय जिनसेंग या विंटर चेरी भी कहा जाता है। कुछ अध्ययनों में भी पाया गया है कि इससे कॉर्टिसोल लेवल बैलेंस हो सकता है और यह स्ट्रेस के साथ-साथ पीसीओडी/पीसीओएस के लक्षणों को भी कम कर सकता है।

दालचीनी : एक अन्य स्टडी में यह पाया गया है कि दालचीनी का सेवन पीसीओएस में इंसुलिन के रेजिस्टेंस के पैरामीटर को प्रभावित कर सकता है।

हल्दी : पीसीओएस में इंसुलिन प्रतिरोध एक अन्य प्रमुख कारक है और अध्ययनों से संकेत मिलता है कि हल्दी इंसुलिन प्रतिरोध में सुधार करने में प्रभावी है। हल्दी में करक्यूमिन नामक एक एंटीऑक्सीडेंट होता है जिससे सूजन को कम करने में मदद मिल सकती है।

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अगर आप भी पीसीओएस से परेशान हैं, तो एक बार किसी आयुर्वेद एक्सपर्ट से सलाह ले सकती हैं। हमें उम्मीद है यह लेख आपकी मदद कर सकेगा। बिना किसी डॉक्टर के सलाह के हम आपको कोई नया ट्रीटमेंट लेने के लिए नहीं कहते हैं। 

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