महाशिवरात्री पर केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने का दिन तय कर लिया गया। भगवान केदारनाथ धाम के कपाट 29 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर खोले जाएंगे। यहां बड़ी संख्या में भक्तों की मौजूदगी में कपाट खुलने का मुहूर्त निकाला गया। 

लाखों भक्तों के लिए इसी दिन से केदारनाथ धाम की यात्रा भी शुरू कर दी जाएगी। ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में केदारनाथ के रावल भीमाशंकर लिंग ने इस शुभ मुहूर्त की घोषणा की।  

इस दिन की घोषणा करते हुए मंदिर के रावल भीमाशंकर लिंग ने कहा कि 26 अप्रैल को डोली रामपुर फाटा जाएगी जबकि बाबा की उत्सव डोली 27 को गौरीकुंड, 28 को केदारनाथ धाम पहुंचेगी जहां 29 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर विश्व प्रसिद्ध धाम के कपाट भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। 

केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने का इंतजार पूरी दुनिया बड़ी बेसब्री से कर रही थी और अब इस बात की भी पूरी उम्मीद है कि जब 29 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलेंगे तो लाखों लोगों की भीड़ यहां दर्शन के लिए पहुंचेगी। 

kedarnath mandir history inside

ये हैं केदारनाथ मंदिर की खासियत 

केदारनाथ धाम हर तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। 

केदारनाथ धाम के बारे में कुछ भी बताने से पहले आपको बता दें कि देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग है। 

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यहां पहाड़ ही नहीं बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है, मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में केदारनाथ धाम के चारों तरफ भारी बर्फ दिखाई देती है। 

यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं। मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। 

लगभग 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। 

यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी। 

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ये है केदारनाथ मंदिर का इतिहास 

पुराण कथा के अनुसार हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना को देखते हुए ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है। 

यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। इसके बाद में 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने एक नए मंदिर का निर्माण कराया जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा रहा।

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ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है और कुछ इतिहासकारों का मानना है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं तब भी यह मंदिर मौजूद था। माना जाता है कि एक हजार वर्षों से केदारनाथ पर तीर्थयात्रा जारी है। कहते हैं कि केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था और बाद में अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने इसका जीर्णोद्धार किया था। 

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ये है केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद होने का कारण   

दिवाली के दूसरे दिन मतलब पड़वा के दिन सर्दियों में केदारनाथ मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6  महीने तक दीपक जलता रहता है। पुरोहित कपाट बंद कर भगवान के विग्रह और दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 

6 महीने बाद में मई या फिर अप्रैल के लास्ट में केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलते हैं तब ही उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है। 6 महीने मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है लेकिन आश्चर्य की 6 महीने तक दीपक भी जलता रहता है। 

केदारनाथ मंदिर से जुड़ी एक और आश्चर्य की बात यह है कि 6 महीने बाद भी कपाट खुलने के बाद वैसी ही साफ-सफाई मिलती है जैसी छोड़कर गए थे।

 

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