जोधपुर में एक ऐसा फेस्टिवल होता है जिसमें लड़कियां लड़कों को दौड़ा-दौड़ाकर डंडा मारती हैं। महिला सशक्तिकरण को लेकर जोधपुर में मनाए जाने वाले ‘धींगा गवर’ मेले का आयोजन केवल सूर्यनगरी जोधपुर में ही नहीं बल्कि मेवाड़ में भी होता है। आप सब ने बरसाने की मशहूर बेंतमार होली के बारे में तो सुना होगा। राजस्थान के मारवाड़ प्रान्त खासकर जोधपुर में मनाए जाने वाले ‘धींगा गवर’ फेस्टिवल में महिलाएं कुंवारे लड़कों को दौड़ा-दौड़ाकर डंडा मारती हैं। मतलब घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर महिलाएं पुरुषों को डंडा मारती हैं। ऐसी मान्यता है कि डंडा अगर किसी लड़के पर लगता है तो उसकी शादी जल्दी हो जाती है। इस फेस्टिवल को बेंतमार गणगौर के रूप में भी जाना जाता है। मारवाड़ में सालों पुरानी मान्यता थी कि धींगा गवर के दर्शन पुरुष नहीं करते थे क्योंकि उस समय में ऐसा माना जाता था कि जो भी पुरुष धींगा गवर के दर्शन कर लेता था उसकी मृत्यु हो जाती थी लेकिन यह मान्यता धीरे-धीरे बदल गई। अब आपको बताते है कि कैसे यह मान्यता बदल गई और पुरुष इस फेस्टिवल में शामिल होने लगे और साथ ही यह फेस्टिवल किस वजह से शुरू हुआ उस बारे में भी बताते हैं। 

dhinga gavar festival

डंडा खाने से होती है शादी जल्दी 

ऐसा कहा जाता है कि सालों पहले धींगा गवर के दर्शन पुरुष नहीं करते थे क्योंकि ऐसा माना जाता था कि जो भी पुरुष धींगा गवर के दर्शन कर लेता था उसकी मृत्यु जल्दी हो जाती थी। ऐसे में धींगा गवर की पूजा करने वाली सुहागिनें अपने हाथ में बेंत या डंडा ले कर आधी रात के बाद गवर के साथ निकलती थी। पूरे रास्तें ये महिलाएं गीत गाती हुई जाती थी इससे आसपास के पुरुषों को पता चल जाता था कि महिलाएं धींगा गवर फेस्टिवल के लिए निकल रही हैं तो वो आसपास भी नहीं घूमते थे। धीरे-धीरे बाद में ऐसी मान्यता बन गई कि जो लड़का महिला से डंडा खाएगा उसका विवाह जल्दी होगा। तब जाकर पुरुष भी इस फेस्टिवल में शामिल होने लगे। 

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धींगा गवर मेला ऐसे हुआ शुरू 

उदयपुर के महाराणा राजसिंह अव्वल ने अपनी छोटी रानी को खुश करने के लिए पारम्परिक रीति के खिलाफ जाकर धींगा गवर को लोकपर्व के रूप में प्रचलित किया था। तब से धींगा गणगौर मेला प्रचलित हुआ। यह छोटी महारानी और कोई और नहीं बल्कि जोधपुर की राठौड़ी राजकुमारी थी। उसी रानी ने जोधपुर में इस परंपरा को आगे बढ़ाया जो फेस्टिवल के तौर पर मनाया जाने लगा। 

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अखंड सौभाग्यवती का वरदान 

इस फेस्टिवल के साथ 16 अंक का सुंदर संयोग जुड़ा हुआ है। धींगा गवर मेला गवर माता की पूजा के सोलहवें दिन मनाया जाता है। महिलाएं 16 दिन तक उपवास रखती हैं फिर 16 शृंगार कर धींगा गवर माता के दर्शन करने निकलती हैं। इस दौरान जो भी महिलाएं सोलह व्रतधारी होती हैं उनकी बांह पर 16   गांठों वाला पवित्र सूत बंधा होता है जिसे सोलहवें दिन उतार कर गवर माता की बांह पर इस उद्देश्य से बांध दिया जाता है कि इस जन्म और अगले जन्म में वह अखंड सौभाग्यवती हो।