Varicella या जिसे हम चिकनपॉक्स/छोटी चेचक कहते हैं वो बहुत ही भयंकर संक्रामक रोग है जो वैरिसेला ज़ोस्टर वायरस (varicella-zoster virus) के कारण होता है। ये वायरस चिकनपॉक्स के मरीजों से उन लोगों तक बहुत ही तेज़ी से पहुंचता है जिन्हें कभी ये बीमारी नहीं हुई है या फिर इसका टीका नहीं लगा है। ये वायरस किसी रोगी के बहुत करीब जाने से फैल सकता है। इस इन्फेक्शन के कारण त्वचा पर खुजली वाले चकत्ते और फफोले पड़ जाते हैं जिनकी शुरुआत सीने से होती है और फिर पीठ पर, चेहरे पर और पूरे शरीर पर फैल जाते हैं। ये बीमारी करीब 4-7 दिनों तक रहती है।

MMR -

MMR यानी मीजल्स, मम्पस और रूबेला (खसरा, कण्ठमाला और रूबेला), एक संक्रमित व्यक्ति इसके वायरस को खांसने, छींकने और बोलने से भी फैला सकता है। इसी के साथ, ये वायरस उन चीज़ों से भी फैल सकता है जिसमें किसी तरह से संक्रमित व्यक्ति की लार लग गई हो। जैसे पानी की बोतल या कप या फिर ये वायरस ऐसी एक्टिविटी से भी फैल सकता है जिसमें लोग संक्रमित व्यक्ति से बहुत करीब आ गए हों जैसे खेल खेलते समय, नाचते समय या किस करते समय।

Measles (खसरा)  इस बीमारी के लक्षण को कई बार आम फ्लू समझ लिया जाता है। संक्रमित व्यक्ति को सर्दी जैसे लक्षण होते हैं जैसे खांसना, छींकना, नाक बहना। शरीर में कई तरह के रैश (खुजली वाले चकत्ते) हो जाते हैं और दस्त भी हो जाते हैं। अगर मरीज़ बहुत ही गंभीर है तो इसका असर दिमाग पर भी हो सकता है। ये जानना बहुत जरूरी है कि इस बीमारी के लक्षण वायरस से संक्रमित होने के 7-14 दिन बाद दिखाई देते हैं।

मम्पस (कंणमाला का रेग), मम्पस की बीमारी में गाल फूल जाते हैं और जबड़ा नरम और सूझा हुआ होता है। मम्पस के साथ बुखार, सिरदर्द, थकान और भूख न लगने जैसे कई लक्षण होते हैं। इसके कारण कान के पास सूजन और बहरापन भी हो सकता है। अगर मरीज की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई तो कुछ मामलों में ये दिमाग में सूजन का कारण भी बन सकता है और महिलाओं को ओवरी में सूजन और दर्द की समस्या हो सकती है।

रुबेला: इस बीमारी में सिरदर्द, बुखार, गले में दर्द, आंखों में इन्फेक्शन आम है। प्रग्नेंट महिला अगर रुबेला से संक्रमित होती है तो उस समय गर्भपात भी हो सकता है या फिर बच्चे के पैदा होने पर उसे कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए अगर किसी प्रेग्नेंट महिला को रुबेला होता है तो उसे गर्भ गिराने को कहा जाता है।

हेपेटाइटिस बी-

ये एक तरह का लिवर इन्फेक्शन है जो हेपेटाइटिस बी वायरस से होता है। ये वायरस शरीर में बना रहता है और ये जिंदगी भर की बीमारी का रूप ले लेता है। हेपेटाइटिस बी में समय के साथ-साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं आती हैं। इसमें लिवर कैंसर या लिवर फेल होना भी शामिल है। हेपेटाइटिस बी होता है जब किसी संक्रमित व्यक्ति का खून या शरीर का कोई और लिक्विड किसी स्वस्थ्य इंसान के शरीर में किसी भी कारण आ जाता है। ये कई तरह से हो सकता है और इनमे से एक ये भी है कि हेपेटाइटिस बी संक्रमित मां से ये बच्चे में आ जाए।

vactination hepatitis pregnancy

हेपेटाइटिस बी शरीर के अंदर ही रहता है, लेकिन इसका पता चलते-चलते कई दशक भी बीत सकते हैं। हालांकि, इसके लक्षण हैं उल्टी, पीली पड़ रही त्वचा, थकान, पेट में दर्द और यूरीन का गहरे रंग का हो जाना।

टीकाकरण की मदद से इन सभी संक्रमणों की रोकथाम-

वेरिसेला या चिकन पॉक्स-

चिकनपॉक्स को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है इसका टीका लगवाना। बच्चे, टीनएजर्स और वयस्कों सभी को दो चिकनपॉक्स वैक्सीन लेने होते हैं अगर उन्हें कभी चिकनपॉक्स नहीं हुआ या उनका टीकाकरण कभी नहीं हुआ है। अगर कोई प्रेग्नेंट महिला वैरिसेला वैक्सीन लेना चाहे तो उसे पहले से बहुत प्लानिंग करनी होती है। ऐसा उनके साथ भी है जो प्रेग्नेंट होना चाहती हैं। डॉक्टर से सलाह के बाद ही इसे लेना सही होता है और अगर कोई महिला प्रेग्नेंट होना चाहे और उसे ये वैक्सीन भी लेना हो तो इस वैक्सीन को लगवाने और कंसीव करने के बीच कम से कम एक महीने का गैप रखना चाहिए।

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MMR:

आम तौर पर बच्चों को MMR के दो डोज देने चाहिए
पहला 12 से 15 महीने की उम्र के बीच
दूसरा 4 से 6 साल की उम्र के बीच

अगर वयस्क इस वैक्सीन को लेना चाहें तो उनकी उम्र 19-60 साल के बीच होनी चाहिए। ये सिर्फ उन लोगों के लिए है जिन्हें वैक्सीन पहले न लगा हो या फिर इसके पहले इन्फेक्शन न हुआ हो। एमएमआर वैक्सीन प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए नहीं होता है और साथ ही उन लोगों को भी ये वैक्सीन नहीं दिया जा सकता है जिनकी इम्यूनिटी वीक हो। जो लोग हेल्थकेयर के लिए काम करते हैं या वो स्टूडेंट्स जो पोस्ट सेकंडरी एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में पढ़ रहे हैं या फिर विदेश जाने की प्लानिंग कर रहे हैं उन्हें MMR के दो डोज लेने चाहिए और इनके बीच 28 दिनों का अंतर जरूर होना चाहिए।


महिलाओं को दो डोज के बीच में प्रेग्नेंसी की प्लानिंग नहीं करनी चाहिए और दूसरा डोज लेने के कम से कम एक महीने के बाद तक इसकी प्लानिंग नहीं करनी चाहिए।

हेपेटाइटिस बी-

प्रेग्नेंट महिलाएं जो हेपेटाइटिस बी से संक्रमित हैं उन्हें Hepatitis B e-antigen (HBeAg) की जांच भी करवानी चाहिए। अगर वो पॉजिटिव पाई जाती हैं तो डॉक्टर उन्हें 30 हफ्तों के लिए ओरल दवाएं दे सकते हैं ताकि बच्चे को हेपेटाइटिस बी होने की गुंजाइश कम हो जाए। जो भी डॉक्टर महिला की डिलिवरी करवाने के लिए जिम्मेदार हो उसे इसकी जानकारी पहले ही दी जानी चाहिए। वो तरीके जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे को हेपेटाइटिस बी न हो वो निम्नलिखित हैं-

बच्चे को पैदा होते ही वैक्सीन के दो शॉट्स दिए जाते हैं। इनमें-

हेपेटाइटिस बी वैक्सीन
हेपेटाइटिस बी इम्यून ग्लोबुलिन शामिल हैं।

साथ ही साथ महिला के पति को भी टेस्टिंग की जरूरत होती है और उसके स्टेटस के अनुसार क्या सावधानियां बरतनी है ये उसे बताया जाता है।

डॉक्टस भाविनी शाह बालाकृष्णन (Consultant Obstetrician and Gynaecologist) को उनकी एक्सपर्ट सलाह के लिए धन्यवाद।