शादी के 7 वचन और उनका मतलब


Bhagya Shri Singh
www.herzindagi.com

    शादी में पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर भावी पति-पत्नी एक दूसरे को 7 वचन देते हैं। इनका मतलब जानें

शादी का पहला वचन

    तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!।

पहले वचन का अर्थ

    लड़की इस वचन में कहती है कि शादी के बाद हर धर्म, कर्म और तीर्थयात्रा में आप मुझे साथ रखना स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का दूसरा वचन

    पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या: , वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम!!

दूसरे वचन का अर्थ

    कन्या इसमें वर से कहती है कि मेरे माता-पिता को अगर आप अपने माता-पिता की तरह सम्मान देते हैं और कुल की मर्यादा रखते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का तीसरा वचन

    जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात, वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं!!

तीसरे वचन का अर्थ

    शादी के इस वचन में कन्या भावी वर से कहती है कि जीवन की तीनों अवस्थाओं में आप मेरा साथ देंगे और मेरी बात मानेंगे तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का चौथा वचन

    कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।।

चौथे वचन का अर्थ

    इसमें कन्या वचन मांगती है कि अभी तक आप परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त थे। लेकिन विवाह के बाद परिवार की समस्त जरूरतों को आप पूरा करने का प्रण लेते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का पांचवां वचन

    स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्‍त्रयेथा, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या!!

पांचवें वचन का अर्थ

    शादी के इस वचन में कन्या कहती है कि अगर आप घर के किसी काम, लेन-दिन या खर्च करने से पहले मेरी राय लेते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का छठा वचन

    न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत, वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!

छठे वचन का अर्थ

    इस वचन में कन्या वर से कहती है कि आप किसी के सामने मेरा अपमान नहीं करेंगे। जुआ और सभी प्रकार के दुर्व्यसन से दूर रहेंगे तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

शादी का सातवां वचन

    परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या!

सातवें वचन का अर्थ

    इसमें कन्या वर से वचन मांगती है कि पराई स्त्रियों को आप माता समान समझेंगे। दाम्पत्य प्रेम में किसी अन्य को भागीदार नहीं बनाएंगे तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

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