सांची स्तूप की रोचक बातें

By Reeta Chaudhary
22 September 2020
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सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित एक छोटा सा गांव है। यह भोपाल से 46 किलोमीटर और बेसनगर, विदिशा से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित। यहां स्थित सांची स्तूप दुनियाभर में मशहूर है।

# सांची स्तूप की खासियत

यह एक बौद्ध स्मारक है और दुनिया की बेहतरीन ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इतिहास के पन्नों के हिसाब से यह बेहद कीमती है। युनेस्को ने साल 1989 में इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया है।

# सांची स्तूप का इतिहास

यह बौद्ध धर्म को मान चुके सम्राट अशोक की विरासत से है, इसलिए इसे बौद्ध धर्म से जोड़कर देखा जाता है। अशोक ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में इसे बौद्ध अध्ययन और शिक्षा केंद्र के तौर पर बनवाया था।

# सांची स्तूप कितना बड़ा है

इस स्तूप का व्यास 36.5 मीटर और ऊंचाई लगभग 21.64 मीटर है। विश्‍वभर में इस फेमस स्मारक के ऐतिहासिक महत्‍व को देखते हुए हर साल देश-विदेश से लाखों लोग इसे देखने आते हैं।

# सांची में ही क्यों स्थित है

इस स्तूप को सांची में इसलिए बनवाया गया क्‍योंकि सम्राट अशोक की पत्नी भले ही विदिशा के व्यापारी की बेटी थीं, लेकिन उनका संबंध सांची से था। पत्‍नी के कहने पर ही अशोक ने इसे यहां बनवाया था।

# सबसे पुरानी शैल संरचना

इस स्तूप को देश की सबसे पुरानी शैल संरचना माना जाता है। इस संरचना को महान स्तूप या स्तूप संख्या-1 कहा जाता है। स्तूप के चारों ओर सुंदर तोरण द्वार पर खूबसूरत कलाकृतियां बनी हुई हैं।

# ग्रीको-बौद्ध शैली का प्रयोग

सारनाथ में मिले अशोक स्तम्भ, जिस पर 4 सिंह बने हुए हैं, वैसा ही अशोक स्तम्भ सांची से भी मिला है| इन स्तंभों का निर्माण ग्रीको-बौद्ध शैली में किया गया था। यह स्तूप बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक है।

# ककनादबोट क्या है

सांची में मिले अभिलेखों में सांची स्तूप को ककनादबोट कहा गया है। इसे साहस, प्रेम, विश्वास और शांति का प्रतीक माना जाता है। राजपूत काल तक इसकी कीर्ति बनी हुई थी, बाद यह गुमनामी में खो गया।

# इसकी दोबारा खोज कैसे हुई

चौदहवीं सदी से लेकर साल 1818 तक, जनरल टेलर द्वारा पुनः खोजे जाने तक सांची सामान्य जन की जानकारी में नहीं था। वहीं, 1912 से 1919 के बीच में सांची स्तूप में मरम्मत का काम करवाया गया।

# संग्रहालय कैसे बना

सर जॉन मार्शल ने जब सांची स्तूप का मरम्मत करवाया, इसी दौरान इस संग्रहालय का निमार्ण करवाया। जिसे बाद में साल 1986 में सांची की पहाड़ी के आधार पर नए संग्रहालय भवन में स्थानांतरित किया गया।

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